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भीलवाड़ा। “श्मशान घाट की दुर्दशा: बारिश में जलती चिताओं तक पहुँचना भी बना चुनौती”

शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक। आज़ादी के 79 साल बाद भी शाहपुरा-विकास से वंचित मालखेड़ा: अंतिम संस्कार के लिए भी रास्ता नहीं है , बारिश में अधजली रह जाती हैं चिताएंशाहपुरा (भीलवाड़ा)। एक ओर देश अमृतकाल और विकसित भारत की बात कर रहा है, वहीं शाहपुरा तहसील की डाबला चांदा ग्राम पंचायत के मालखेड़ा गांव के ग्रामीण…

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शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक।

आज़ादी के 79 साल बाद भी शाहपुरा-विकास से वंचित मालखेड़ा: अंतिम संस्कार के लिए भी रास्ता नहीं है , बारिश में अधजली रह जाती हैं चिताएंशाहपुरा (भीलवाड़ा)। एक ओर देश अमृतकाल और विकसित भारत की बात कर रहा है, वहीं शाहपुरा तहसील की डाबला चांदा ग्राम पंचायत के मालखेड़ा गांव के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

लगभग 700 मतदाताओं वाले इस गांव की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां मृतकों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार तक के लिए उचित व्यवस्था नहीं है।ग्रामीणों के अनुसार गांव से लगभग 2 किलोमीटर दूर स्थित श्मशान घाट तक जाने के लिए कोई पक्का और सुगम रास्ता नहीं है। अतिक्रमण के कारण रास्ता बेहद संकरा हो चुका है तथा अधिकांश भाग कच्चा होने से बारिश के दिनों में कीचड़ और जलभराव से पूरी तरह दुर्गम बन जाता है।

कई स्थानों पर एक-एक फीट तक कीचड़ जमा हो जाता है, जिससे शव यात्रा निकालना भी अत्यंत कठिन हो जाता है।बारिश में अधूरी रह जाती हैं अंतिम क्रियाएं, वहा तक साधन जाना तो दूर है लेकिन वृद्ध आदमी भी पैदल जाने से वंछित हो जाते हैं।

ग्रामीणों का दर्द और भी बड़ा है। उनका कहना है कि बरसात के दौरान कई बार अंतिम संस्कार के समय अचानक बारिश आ जाने से चिता पूरी तरह नहीं जल नहीं पाती और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। श्मशान घाट पर किसी प्रकार का स्थायी टीन शेड या छायादार संरचना नहीं होने के कारण, कई बार चिताएं अधजली रह जाने की स्थिति तक बन जाती है, जो मृतक और उसके परिजनों की भावनाओं को गहरा आघात पहुंचाती है।

खेतों के बीच से गुजरती है अंतिम यात्रा

श्मशान तक पहुंचने के लिए कई स्थानों पर खेतों के मध्य से होकर गुजरना पड़ता है। यदि खेतों में फसल खड़ी हो तो ट्रैक्टर या अन्य साधनों को ले जाना और भी मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों को खेत मालिकों से अनुमति लेकर संकरे रास्तों और खेतों के बीच से अंतिम यात्रा निकालनी पड़ती है। पहले वहा चरागा क्षेत्र था अब अतिक्रमण से वहा खेत बना दिए गए इससे कई बार विवाद और असुविधा की स्थिति भी उत्पन्न होती है।

बबूल के कांटे और दुर्गम रास्ताग्रामीण बताते हैं कि रास्ते में जगह-जगह बबूल के कांटे और झाड़ियां फैली हुई हैं। कई स्थानों पर पैदल चलना तक मुश्किल है। अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले बुजुर्ग, और बच्चे भी इस पीड़ा को झेलने के लिए मजबूर हैं।

पानी के लिए भी संघर्षगांव मे चंबल जल परियोजना द्वारा लाइन भी के के बावजूद नियमित जलापूर्ति नहीं हो रही है। ग्रामीणों के अनुसार कभी चार दिन तो कभी एक सप्ताह बाद पानी की सप्लाई होती है। ऐसे में लोगों को पीने के पानी के लिए लगभग 3 किलोमीटर दूर रेहड गांव से अपने अपने साधनों मे पानी की केने लाना पड़ता है।ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान घाट तक सड़क, अतिक्रमण हटाने, शेड निर्माण और पेयजल समस्या के समाधान के लिए कई बार शासन प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया गए, लेकिन वर्षों बाद भी हालात जस के तस हैं।

ग्रामीणों की चेतावनीग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही श्मशान घाट तक पक्का रास्ता, शेड निर्माण और पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई तो गांववासी एकजुट होकर धरना-प्रदर्शन एवं जनआंदोलन करने को मजबूर होंगे।ग्रामीणों का सवाल”जब देश चांद और डिजिटल युग की बात कर रहा है, तब मालखेड़ा के लोग आज भी अपने परिजनों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष क्यों कर रहे हैं?

“अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर समस्या पर कब तक ध्यान देता है और मालखेड़ा के ग्रामीणों को उनके अधिकारों के अनुरूप मूलभूत सुविधाएं कब उपलब्ध हो पाती हैं।

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