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भौंरासा की आरा मशीनें बनीं अवैध लकड़ियों के गोदाम! प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा खेल— वन विभाग मौन

पवन परमार जिला ब्यूरो संवाददाता जिला देवास देवास। भौंरासा क्षेत्र में इन दिनों लकड़ी माफियाओं का आतंक चरम पर है। हरे-भरे जंगलों को बेरहमी से काटकर रोज़ाना 407 वाहनों से लकड़ियाँ भौंरासा की आरा मशीनों तक पहुंचाई जा रही हैं— जो अब खुलेआम अवैध लकड़ी के गोदामों में तब्दील हो चुकी हैं।स्थानीय सूत्रों के अनुसार,…

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पवन परमार जिला ब्यूरो संवाददाता जिला देवास देवास।

भौंरासा क्षेत्र में इन दिनों लकड़ी माफियाओं का आतंक चरम पर है।

हरे-भरे जंगलों को बेरहमी से काटकर रोज़ाना 407 वाहनों से लकड़ियाँ भौंरासा की आरा मशीनों तक पहुंचाई जा रही हैं— जो अब खुलेआम अवैध लकड़ी के गोदामों में तब्दील हो चुकी हैं।स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इन मशीनों से हर महीने हजारों रुपए की अवैध उगाही की जा रही है, जबकि वन विभाग पूरी तरह मौन है। न निरीक्षण, न कार्रवाई— मानो विभाग की आँखों पर पट्टी बंधी हो।

नियमों के मुताबिक हर आरा मशीन पर लकड़ी का रजिस्टर मेंटेन करना और समय-समय पर जांच अनिवार्य है, लेकिन हकीकत में न तो कोई स्टॉक रजिस्टर है, न कोई रिकॉर्ड। कई मशीनों पर तो प्रतिबंधित प्रजातियों की लकड़ियाँ— आम, जामुन, इमली, खैर, करंज, महुआ, साल, शीशम और अर्जुन— खुलेआम चिराई जा रही हैं।

चौंकाने वाला तथ्य: जिले में सबसे ज़्यादा आरा मशीनें भौंरासा में चल रही हैं, मगर वन विभाग और प्रशासन अब तक अनजान बना हुआ है। बताया जा रहा है कि बिट के नाकेदार और डिप्टी रेंजर तक कथित रूप से माफियाओं से मिले हुए हैं— तभी तो अवैध लकड़ी के 407 वाहनों से दिन-रात बिना किसी डर के गुजर रहे हैं।

स्थानीय सामाजिक संगठनों और रहवासियों ने इस पूरे मामले पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि अगर यही हाल रहा, तो आने वाले कुछ वर्षों में भौंरासा के आसपास के जंगल सिर्फ नक्शों में रह जाएंगे।

बड़े सवाल खड़े करती है वन विभाग की खामोशी—क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर मिलीभगत का खुला खेल?

क्या अधिकारी माफियाओं से सांठगांठ कर जंगलों की कीमत पर अपनी जेबें भर रहे हैं?कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं,आरा मशीन संचालक को लकड़ी की प्राप्ति व उपयोग का पूरा विवरण रजिस्टर में दर्ज करना अनिवार्य है।

बिना ट्रांजिट परमिट (TP) लकड़ी का परिवहन वन अधिनियम के तहत अपराध है।महुआ, इमली, शीशम, साल, अर्जुन, तेंदू, खैर जैसी प्रजातियों की कटाई या चिराई बिना अनुमति प्रतिबंधित है।मशीनों से निकलने वाले अपशिष्ट और धूल (sawdust) का निस्तारण पर्यावरण मानकों के अनुसार होना चाहिए।

अब सवाल जनता का—जब जंगल उजड़ रहे हैं, तो वन विभाग कब जागेगा?कब तक चलेगा भौंरासा का यह लकड़ी माफिया राज? “अगर प्रशासन ने अब भी कार्रवाई नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियों को जंगल नहीं, सिर्फ वीरान ज़मीनें मिलेंगी।”

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