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जिला अस्पताल में कबाड़ एंबुलेंस बनी रैन बसेरी ठंड में मरीजों के परिजनों के लिए बना अस्थायी

आशियाना, कलेक्टर की पहल से मिली बड़ी राहत।दतिया। जिला अस्पताल में इलाज कराने आने वाले मरीजों के परिजनों की वर्षों पुरानी समस्या पर आखिरकार प्रशासन ने ध्यान दिया है। अस्पताल में भर्ती मरीजों के साथ आए परिजनों के लिए रात बिताने की कोई ठोस व्यवस्था न होने के कारण उन्हें ठंड के मौसम में खुले…

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आशियाना, कलेक्टर की पहल से मिली बड़ी राहत।दतिया। जिला अस्पताल में इलाज कराने आने वाले मरीजों के परिजनों की वर्षों पुरानी समस्या पर आखिरकार प्रशासन ने ध्यान दिया है।

अस्पताल में भर्ती मरीजों के साथ आए परिजनों के लिए रात बिताने की कोई ठोस व्यवस्था न होने के कारण उन्हें ठंड के मौसम में खुले आसमान के नीचे या अस्पताल परिसर में जैसे-तैसे रात गुजारनी पड़ती थी।

टीनशेड जरूर बना हुआ था, लेकिन वह चारों ओर से खुला होने के कारण न तो ठंड से बचा पाता था और न ही बारिश या तेज हवा से कोई राहत देता था।अक्सर परिजन मजबूरी में अस्पताल की दीवारों से टिककर, गलियारों में जमीन पर या मरीजों के बेड के आसपास बैठकर रात काटते नजर आते थे।

इस स्थिति से न केवल उन्हें शारीरिक परेशानी होती थी, बल्कि बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए यह और भी ज्यादा कष्टदायक साबित हो रही थी। कलेक्टर की अनोखी और व्यावहारिक पहल, इन हालातों को देखते हुए कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने निरीक्षण के दौरान तुरंत एक अनोखा लेकिन बेहद

, व्यावहारिक समाधान निकाला। अस्पताल परिसर में लंबे समय से खराब और कबाड़ हो चुकी एंबुलेंसों को देखकर उन्होंने इन्हें रैन बसेरा के रूप में उपयोग में लाने का निर्णय लिया। कलेक्टर के निर्देश पर पूरी तरह जर्जर पड़ी एक एंबुलेंस की साफ-सफाई करवाई गई।

इसके अंदर बैठने और सोने की उचित व्यवस्था की गई, ताकि परिजन सुरक्षित और अपेक्षाकृत आरामदायक तरीके से रात बिता सकें। साथ ही एंबुलेंस में बुनियादी सुरक्षा इंतजाम भी सुनिश्चित किए गए हैं। तीन लोगों के ठहरने की व्यवस्था, नई व्यवस्था के तहत एक एंबुलेंस में करीब तीन लोग आराम से रात गुजार सकते हैं।

इस पहल को आरटीओ विभाग के सहयोग से मूर्त रूप दिया गया। कबाड़ में पड़ी एंबुलेंस अब परिजनों के लिए ठंड से बचाव का सहारा बन गई है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था खासतौर पर उन परिजनों के लिए कारगर होगी,

जो दूर-दराज के गांवों से इलाज के लिए जिला अस्पताल आते हैं और आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण होटल या अन्य ठहरने की व्यवस्था नहीं कर पाते। आगे और एंबुलेंस को बनाया जाएगा रैन बसेरा

,फिलहाल एक ही एंबुलेंस को रैन बसेरा के रूप में तैयार किया गया है। कलेक्टर वानखड़े ने संकेत दिए हैं कि यदि यह प्रयोग सफल और उपयोगी साबित होता है, तो अस्पताल परिसर में खड़ी अन्य पुरानी और अनुपयोगी एंबुलेंसों को भी इसी तरह परिजनों के लिए रैन बसेरा में बदला जाएगा।

सराहना का विषय बनी पहल, कलेक्टर की इस पहल को आमजन और मरीजों के परिजनों द्वारा सराहा जा रहा है। सीमित संसाधनों में “जुगाड़ से समाधान” की यह मिसाल न केवल मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि थोड़ी सी संवेदनशीलता

और इच्छाशक्ति से बड़ी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। जिला अस्पताल में कबाड़ एंबुलेंस को रैन बसेरा बनाकर प्रशासन ने यह संदेश *दिया है कि मरीजों के साथ-साथ उनके परिजनों की सुविधा और गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

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