प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
बिहार में कम गुणवत्ता वाले घटिया एवं नकली दवा का कारोबार सालाना 50 करोड़ से ज्यादा हैं।इस रैकेट के द्वारा न सिर्फ आम लोग बल्कि सरकार को भी प्रतिमाह लाखों का चूना लगाया जा रहा हैं।शहर से लेकर गाँव तक नकली दवाईयां खपाने का कारोबार बड़ी तेजी से जड़े जमाता जा रहा हैं।
मधुबनी जिला मुख्यालय सहित राजनगर,खजौली, जयनगर,बेनीपट्टी, खुटौना,बाबूबरही एवं अन्य बाजारों में बड़े पैमाने पर नकली एवं अवैध दवा दुकानों का संचालन जारी हैं।कथित लाईसेंसी दुकानदार भी निर्धारित मानदण्ड की धज्जियां उड़ा रहे हैं।एक फार्मासिस्ट के प्रमाण पत्र की छायाप्रति के आधार पर पांच से दस दुकानें चल रही हैं।
स्थानीय नागरिकों ने इसके लिए निरीक्षक सहित अन्य विभागीय कारिन्दों को जिम्मेवार ठहराया हैं।ज्ञातव्य हो कि इन बाजारों से लेकर गांवों तक झोला छाप डॉक्टरों की प्रैक्टिस जारी हैं।
यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव की एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारतीय बाजार में बिकने वाले सभी दवा उत्पाद में से बीस फीसद नकली हैं। 2018 में, सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गनाइजेशन ने जानकारी दी थी कि भारतीय बाजार में मौजूद कुल जेनेरिक दवाओं में लगभग 4.5 फीसदी दवाएं घटिया थीं। इसी तरह से विश्व स्वास्थ्य संगठन भी पहले से कहता आ रहा है कि भारत सहित एशियाई देशों के दस फीसद से अधिक दवा उत्पाद नकली हैं। इसके बावजूद राजधानी दिल्ली सहित देश के महानगरों में मानक रहित गुणवत्ताहीन औषधियों के थोक विक्रय बाजार र्निमित हो चुके हैं और दवा माफिया इन बाजारों को संचालित कर रहा है।
अफ्रीकी देश गाम्बिया में हाल ही में 69 बच्चों की मौत के बाद भारतीय दवा कंपनियां फिर से सुर्खियों में आ गई हैं। कई जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों को भारत में निर्मित खांसी की दवा दी गई थी। जिसके पीने के बाद ही बच्चों की हालत बिगड़ी। इस दवा का निर्माण भारतीय कंपनी मेडन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड ने किया था और चार-चार अलग अलग ब्रांड के तहत इसे अफ्रीकी देश में निर्यात किया था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इन चारों दवाओं में डाइथाइलीन ग्लाइकोल और इथाईलीन की मात्रा सुरक्षित मानकों से ‘अस्वीकार्य स्तर तक’ ज्यादा पाया गया, जो घातक हुआ। इसके पहले भी देश के जम्मू, मुंबई और गुरुग्राम में नकली दवा उत्पाद से बच्चों के बीमार होने और मौत के मामले सामने आ चुके हैं। मगर कोई भी जांच सजा के मुकाम तक नहीं पहुंच सकी है।
भारत के संविधान में स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है। मगर देश का नागरिक स्वास्थ्य को लेकर सर्वाधिक प्रताड़ित है। स्वास्थ्य परीक्षण से लेकर दवाओं के निर्माण तक पूरा क्षेत्र अविश्वसनीयता से भरा पड़ा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अनायास आए स्वास्थ्य और दवाओं के खर्चों के कारण देश के तीन करोड़ लोग प्रतिवर्ष गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं।
देश के आम नागरिक के आर्थिक और सामाजिक हितों की रक्षा के लिए आज पूरा चिकित्सा तंत्र एक बड़े परिवर्तन की मांग कर रहा है। क्योंकि चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश का द्वार ही पैसे की प्राथमिकता से खुलता है। समय-समय पर चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश को लेकर अनियमितताओं की शिकायतें मिलती रही हैं। महंगी शिक्षा और निजी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों की अनैतिक वसूली के चक्रव्यूह से निकल कर चिकित्सा पेशा अपनाने वालों से समाजसेवा की उम्मीद बेमानी है। भारत में मरीज परीक्षण शुल्क का कहीं कोई पैमाना नहीं है। पहली बार शुल्क अदा करने के बाद मरीज कितने समय तक निशुल्क परामर्श ले सकता है, इसका निर्धारण भी इस सेवा क्षेत्र में नहीं है।
देश में पैथोलाजी जांचों में सरकारी स्तर पर दरों के निर्धारण का अधिकार जिला स्वास्थ्य अधिकारी को होता है। मगर देश के अधिकांश जिलों में वर्षों से नई दरें लागू नहीं हुई हैं। जिले के चिकित्सा अधिकारी भी इस कर्तव्य को भूल चुके हैं।
अधिकतर निजी पैथोलाजी में जांच दरें महंगी होने की वजह उनके संचालकों को हर जांच में कमीशन का एक हिस्सा चिकित्सकों को देना होता है। दूसरी तरफ, देश में दवाओं के निर्माण से लेकर उनके विक्रय तक पूरा उद्योग विसंगतियों से भरा पड़ा है। दवाओं की गुणवत्ता परखने वाली त्वरित प्रयोगशालाओं की कमी है। देश की जनसंख्या, दवाओं के निर्माण और खपत के आधार पर इनके विस्तार पर सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया है। देश में मात्र तीन दवा परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं, जहां से परीक्षण रिपोर्ट कम से कम छह माह की अवधि में मिलती है। राज्यों में दवा निरीक्षकों के सत्तर फीसद पद खाली हैं, इसलिए दवाओं की दुकानों पर अब नियमित जांच नहीं होती।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कुछ वर्ष पहले केंद्र सरकार को भेजी रिपोर्ट में कहा था कि भारत में नकली दवा का कारोबार पैंतीस फीसद तक जा पहुंचा है
।कमीशन और सस्ती निविदाओं के माध्यम से इन दवाओं की पहुंच सरकारी दुकानों तक हो चुकी है। मगर सरकारों की तरफ से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। भारत विश्व में सबसे बड़ा जेनेरिक दवाओं का निर्माता देश होने के साथ विश्व का तीसरा बड़ा दवा निर्यातक है। गुणवत्ता निंयत्रण न होने से देश की व्यापारिक छवि खराब होती है। इनमें भी पंद्रह से तीस फीसद दवाएं इसलिए मानक रहित हैं कि उनका कच्चा माल चीन जैसे देशों से आयातित घटिया दर्जे का उत्पाद है, जिसे यूरोप सहित विश्व के अनेक देशों ने प्रतिबंधित किया है।
मगर सस्ता होने के कारण भारत की छोटी दवा निर्माता कंपनियां इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती हैं।
भारत में इस सेवा क्षेत्र की तीसरी बड़ी खामी दवाओं के मूल्य नियंत्रण की है। सरकार ने नामी दवा कंपनियों को उनकी अनुसंधान लागत के आधार पर कीमत तय करने की आजादी दी है। देश में एक ही फार्मूले पर आधारित अलग-अलग कंपनियों के दवा मूल्यों में जमीन आसमान का अंतर है। अनुसंधान खर्चों में बढ़ोतरी दिखाकर हर छह माह में दवाओं के मूल्य में वृद्धि कर दी जाती है। सरकार कुछ जीवन रक्षक दवाओं पर मूल्य नियंत्रण की बात करती जरूर है, लेकिन ऐसी दवाओं की संख्या देश में बिकने वाली दवाओं का पांच फीसद भी नहीं है।
जेनेरिक दवाओं के उत्पादन की अनुमति सस्ती दवाओं की उपलब्धता के मकसद से दी गई थी। मगर इन दवाओं पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य ब्रांडेड दवाओं के मूल्य से मामूली कम अंकित किया जाता है। यह विक्रेता पर निर्भर करता है कि वह अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए कितनी अधिक छूट ग्राहक को देता है।
सन 2008 में केंद्र सरकार की पहल पर कम कीमत पर ग्राहकों को दवा उपलब्ध कराने के लिए देश में जनऔषधि केंद्र खोले गए, लेकिन इन केंद्रों पर दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता आज तक नहीं हो सकी है। भारतीय चिकित्सा परिषद ने डाक्टरों से ब्रांडेड दवाओं के साथ उसके समकक्ष जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य किया है। मगर पांच फीसद चिकित्सकों ने भी इसकी अनुपालना को आवश्यक नहीं समझा है।
जबकि, सन 2014 से यूरोपीय देशों में जेनेरिक दवाओं के प्रचलन में चौबीस फीसद की वृद्धि देखी गई है। महंगाई के बाद अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी जेनेरिक दवाओं के उपयोग में वृद्धि हुई है। मगर भारत में साजिश के तहत इसकी बिक्री को चिकित्सकों द्वारा हतोत्साहित किया जा रहा है।
अधिकांश दवा कंपनियां चिकित्सकों को दवा लिखने के लिए महंगे तोहफे देती हैं, जबकि भारतीय कानून में यह अपराध है। दवा कंपनियों की बिक्री बढ़ाने के लिए डाक्टर अतिरिक्त एंटीबायोटिक दवाएं लिखने से भी परहेज नहीं करते हैं। गरीबों के इलाज के लिए चलाई गई आयुष्मान योजना भ्रष्टाचार का शिकार होकर निजी अस्पतालों को फायदा पहुंचाने वाली योजना के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। इस योजना के माध्यम से पैसा कमाने की चाह रखने वाले गैर-चिकित्सक देश भर में अस्पताल खोलने की प्रतिस्पर्धा में शामिल हो चुके हैं।
राजनीतिक प्रभाव से मानकहीन अस्पताल, जहां मानव सुरक्षा तक का बंदोबस्त नहीं है, बेखौफ संचालित हो रहे हैं।
विडंबना इस देश के कानून की भी है कि देश में मेडिकल स्टोर के लाइसेंस के लिए फार्मसिस्ट में उपाधि की अनिवार्यता है, पर अस्पताल संचालक के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता आवश्यक नहीं समझी गई है। नतीजा, अस्पतालों में जिंदा जलते मरीजों के दिल दहलाने वाले चित्र सामने आते रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल दो लाख मौते नकली या घाटियां दवाओं के कारण होती हैं।नकली दवाओं का कारोबार दुनियां भर में 75 अरब अमेरिकी डॉलर का हर साल हो रहा हैं।दुनियां भर में बिक रही कुल दवाओं का दस प्रतिशत से अधिक नकली या घटियां दवाओं का हैं।भारत मे हुए विभिन्न सर्वेक्षण के अनुसार 12.25 प्रतिशत दवाईयां या तो नकली हैं या कम गुणवत्ता वाली हैं।
बिहार सहित मधुबनी जिले में नकली दवाओं का कारोबार फलने-फूलने की सूचनाएं आए दिन मिलती हैं। इसके बावजूद अभी तक इसकी जांच नहीं हो पा रही हैं।स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार इस पर कोई भी ठोस कारवाई नही कर पा रही हैं। आखिर यह जहर का कारोबार कब तक चलता रहेगा ?
लेखक – स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्र एवं चैनलों में अपनी योगदान दे रहे हैं। मोबाइल – 8051650610















