सोशल मीडिया को दोष देने से पहले जनता के दर्द को समझना होगा- लोकेंद्र गुर्जर
आज कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और लेखक सोशल मीडिया पर चल रहे “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे शब्दों को लेकर चिंता जता रहे हैं। वे इसे समाज में बढ़ती अराजकता और नकारात्मकता का प्रतीक बता रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर यह आक्रोश पैदा क्यों हुआ?
क्या जनता बिना कारण व्यवस्था पर कटाक्ष कर रही है? क्या देश का युवा, किसान, मजदूर, व्यापारी और मध्यम वर्ग यूँ ही व्यवस्था से नाराज़ बैठा है?सच्चाई यह है कि आज आम नागरिक खुद को उपेक्षित, ठगा हुआ और अपमानित महसूस कर रहा है।
जब जनता की समस्याएँ वर्षों तक अनसुनी रहती हैं, तब व्यंग्य जन्म लेता है। जब व्यवस्था जनता को सिर्फ वोट समझने लगे और इंसान नहीं, तब सोशल मीडिया जनता की आवाज़ बन जाता है।
आज देश का युवा बेरोजगारी से टूट चुका है। लाखों पढ़े-लिखे युवा डिग्रियाँ लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं। सरकारी नौकरियों के नाम पर वर्षों तक भर्तियाँ अटकी रहती हैं और जब परीक्षाएँ होती भी हैं, तो पेपर लीक हो जाते हैं। मेहनत करने वाला छात्र निराश हो जाता है और भ्रष्ट तंत्र मज़े से चलता रहता है।
आखिर युवा अपनी पीड़ा कहाँ व्यक्त करे? महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। रसोई गैस, पेट्रोल, डीज़ल, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की चीज़ें लगातार महंगी होती जा रही हैं। किसान को उसकी फसल का उचित दाम नहीं मिलता, व्यापारी टैक्स और नियमों के बोझ से परेशान है, मजदूर अपनी मेहनत का पूरा मूल्य नहीं पा रहा।
लेकिन सत्ता और व्यवस्था में बैठे लोग जनता की तकलीफों को महसूस करने के बजाय सिर्फ प्रचार और छवि निर्माण में लगे दिखाई देते हैं।सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज सामाजिक असमानता और राजनीतिक अहंकार लगातार बढ़ रहा है।
आम आदमी की आवाज़ को महत्व नहीं दिया जाता। जो सवाल पूछता है, उसे ट्रोल, अराजक, विरोधी या अनपढ़ कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार होता है। लेकिन जब व्यवस्था आलोचना सुनने की क्षमता खो देती है, तब जनता व्यंग्य और कटाक्ष के माध्यम से अपनी बात कहती है।
कुछ लोग सोशल मीडिया को दोष दे रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि सोशल मीडिया ने पहली बार आम नागरिक को बोलने की ताकत दी है। पहले जनता की आवाज़ बड़े मीडिया घरानों और राजनीतिक प्रभाव के नीचे दब जाती थी, लेकिन आज एक सामान्य युवक भी अपने मोबाइल से व्यवस्था से सवाल पूछ सकता है। यही बात कुछ लोगों को असहज कर रही है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” कोई राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ जनता का प्रतीकात्मक विरोध है, जिसमें आम नागरिक को महत्वहीन समझा जाता है। जब जनता को सम्मान नहीं मिलेगा, जब युवाओं का भविष्य असुरक्षित रहेगा, जब भ्रष्टाचार व्यवस्था की पहचान बन जाएगा, जब गरीब और मध्यम वर्ग लगातार संघर्ष करेगा, तब समाज में आक्रोश भी पैदा होगा और व्यंग्य भी।आज जरूरत सोशल मीडिया पर जनता को दोष देने की नहीं, बल्कि उन समस्याओं को हल करने की है जो इस आक्रोश की जड़ हैं।
भ्रष्टाचार खत्म हो, बेरोजगारी पर ठोस नीति बने, पेपर लीक माफिया पर सख्त कार्रवाई हो, किसानों और व्यापारियों को सम्मान मिले, शिक्षा और स्वास्थ्य मजबूत हों, सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो और सत्ता में बैठे लोग अहंकार छोड़कर जनता की बात सुनें — तभी हालात बदलेंगे।
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। जनता को “कॉकरोच” समझने वाली मानसिकता ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जिस दिन व्यवस्था जनता को सम्मान देना शुरू कर देगी, उस दिन सोशल मीडिया पर गुस्से की जगह विश्वास दिखाई देगा।
क्योंकि सच्चाई यही है —जनता चुप जरूर रह सकती है, लेकिन अपमान कभी नहीं भूलती।(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति एवं अध्यक्ष — Backward Classes Indian Chamber of Commerce and Industry (BICCI) हैं।)















