शहीदों के बीच भी भेदभाव

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इंदौर के बेटे मेजर हमजा आरिफ की शहादत पर उठे सवाल, अंतिम विदाई में जनप्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी का दावा

अंधेर नगरी समाचार इंदौर मप्र संजय सोलंकी इंदौर।

देश की रक्षा करते हुए शहादत देने वाले इंदौर के वीर सपूत मेजर हमजा आरिफ को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।

परिवार, सेना के जवानों और शहरवासियों ने नम आंखों से अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि दी।लेकिन इस अंतिम विदाई के बीच एक सवाल ने लोगों को झकझोर दिया है—क्या शहीदों के सम्मान में भी भेदभाव होने लगा है?दावा किया जा रहा है कि मेजर हमजा आरिफ के अंतिम संस्कार में शहर का एक भी जनप्रतिनिधि श्रद्धांजलि देने नहीं

पहुंचा। यदि यह दावा सही है तो यह केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर सवाल है।शहादत की कोई जाति और धर्म नहीं होता!मेजर हमजा आरिफ ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। सीमा पर तैनात जवान जब देश के लिए जान देता है, तब उसकी पहचान सिर्फ भारत का सैनिक और देश का बेटा होती है।ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि—जब वोट मांगने के लिए

जनप्रतिनिधि जनता के बीच पहुंच सकते हैं, तो शहीद के अंतिम संस्कार में दो मिनट श्रद्धांजलि देने के लिए क्यों नहीं?क्या किसी शहीद का सम्मान उसकी जाति, धर्म या राजनीतिक पहचान देखकर तय होगा?अगर जनप्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी की बात सही है, तो इसकी वजह जनता के सामने स्पष्ट होनी चाहिए।मेजर हमजा आरिफ की शहादत को सलाम।शहीद किसी एक समुदाय का नहीं, पूरे देश का होता है।

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