चंदे की तिजोरी सेवा समाज नाट्य कला परिषद का काला सच

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प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार मधुबनी जिले के राजनगर बाजार के बीचों-बीच राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी का प्रांगण है। कभी यहां किताबों की सरसराहट सुनाई देती थी। आज उसी जगह से देर रात तक डीजे की आवाज और गानों की गूंज आती है। इस आवाज का स्रोत है “सेवा समाज नाट्य कला परिषद” का मंच। नाम बहुत बड़ा है, पर काम सिर्फ एक – चंदा लेना और हिसाब न देना। इस परिषद को लेकर सबसे बड़ी सच्चाई ये है कि इसे सरकार से कोई मोटा अनुदान नहीं मिलता ऐसी बात नहीं हैं । कला संस्कृति विभाग की फाइलों में इसका नाम भी शायद ही कहीं हो। फिर भी हर साल यहां लाखों का लेन-देन होता है।

पैसा आता कहां से है? जवाब है – राजनगर के व्यापारियों और आम जनता की जेब से। 26 जनवरी हो या 15 अगस्त, हो या कोई और कार्यक्रम, रसीद बही लेकर लोग दुकान-दुकान जाते हैं। चंदा दो, वरना सामाजिक बहिष्कार की धमकी। एक-एक कार्यक्रम में लाखों खर्च दिखाए जाते हैं। पर वो खर्च होता कहां है, इसका कोई ब्यौरा आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ।

2019 में कई पत्र -पत्रिका के साथ “बिहार से दिल्ली तक” मैगजीन ने इस परिषद के खिलाफ बड़ा खुलासा किया था। लिखा था कि भवन निर्माण के नाम पर लाखों की सामग्री गायब कर दी गई है। कुर्सी, पंखा, टीना, लकड़ी, ईंट – सब कागज पर बेचे गए पर जमीन पर नहीं मिले।कहां था ” हम विलेन हैं ” l उस समय भी तत्कालीन पदाधिकारियों ने पत्रकारों को धमकी दी थी।पंचायत भी बुलाई गई l लेकिन समाज ने पत्रकार के पक्ष में बात उठाई l

सात साल बीत गए। ना सामग्री मिली, ना कोई जांच हुई, ना कोई दोषी पकड़ा गया। आज भी वही लोग कुर्सी पर काबिज हैं। न जाने कई साल से चुनाव का नामोनिशान नहीं। आज कोई अध्यक्ष है तो कल सचिव। परसों कोषाध्यक्ष। आरोप हैं की आपस में मनमुटाव भी खूब है, पर पैसा बांटने के समय सब एक हो जाते हैं। परिषद का रजिस्ट्रेशन है या नहीं, ये भी कोई नहीं जानता। आय-व्यय का ऑडिट तो दूर की बात है।

सबसे दुखद बात ये है कि ये मंच राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी की जमीन पर बना है। वो लाइब्रेरी जो ज्ञान का मंदिर मानी जाती है। आज उसी मंदिर के प्रांगण में फूहड़ गानों पर डांस होता है। स्थानीय कलाकारों के लिए यहां कोई जगह नहीं है। बाहर से महंगी सिंगर बुलाई जाती हैं। इन्द्र पूजा मेले में तो आठ – दस दिन तक डीजे बजता है, अश्लील कार्यक्रम होता हैं, जुआ, तास रात भर होता हैं l आसपास के घरों के बच्चे पढ़ नहीं पाते, मरीज सो नहीं पाते, बुजुर्ग चैन से बैठ नहीं पाते।

जब सवाल उठाओ तो जवाब मिलता है “ये समाज सेवा है”। कैसी सेवा? जहां सेवा के नाम पर सिर्फ वसूली हो, संस्कृति के नाम पर सिर्फ अश्लीलता परोसी जाए, और सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जा हो।

राजनगर की जनता अब चुप नहीं बैठेगी। हम जिला प्रशासन से मांग करते हैं कि तुरंत तीन काम किए जाएं। पहला, लाइब्रेरी की जमीन किसकी है और परिषद इसे किस अधिकार से इस्तेमाल कर रही है, इसका कागज सार्वजनिक किया जाए। दूसरा, 2019 में लगे भवन निर्माण घोटाले की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो। तीसरा, परिषद के पिछले 10 साल का आय-व्यय और चंदा रसीद बही की जांच हो। अगर प्रशासन 15 दिन में कार्रवाई नहीं करता तो हम सूचना आयोग और माननीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।

क्योंकि बिना सरकारी पैसे के भी अगर करोड़ों का खेल हो सकता है, तो इसका मतलब साफ है – ये खेल जनता के भरोसे और राजनगर की इज्जत के साथ हो रहा है। और अब ये और नहीं चलेगा।”सेवा समाज नाट्य कला परिषद – नाम बदलो या काम बदलो।”

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