क्या QR कोड से बचेगी पत्रकारिता?जब अखबार पाठकों के सामने हाथ फैलाने लगे
क्या QR कोड से बचेगी पत्रकारिता?जब अखबार पाठकों के सामने हाथ फैलाने लगे
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
पिछले एक साल में एक दृश्य आम हो गया है। आप किसी स्थानीय अखबार का आखिरी पन्ना पलटते हैं, किसी साहित्यिक पत्रिका का संपादकीय पढ़ते हैं या किसी यूट्यूब चैनल पर स्वतंत्र पत्रकार की रिपोर्ट देखते हैं तो अंत में एक ही अपील मिलती है। एक Paytm, PhonePe या Google Pay का QR
कोड और उसके नीचे दो लाइनें, स्वतंत्र पत्रकारिता को बचाने में मदद करें, आपके छोटे सहयोग से बड़ी पत्रकारिता जिंदा रहेगी। कल तक जो प्रेस नेताओं से सवाल पूछती थी, आज वही प्रेस पाठकों से दस, बीस, पचास रुपये का सहयोग मांग रही है। यह दृश्य तकलीफ देता है, लेकिन यही आज की सबसे बड़ी सच्चाई भी है।
हमारे समय में अखबार तीन चीजों से चलता था, पाठक से मिलने वाला मूल्य, सरकारी विज्ञापन और बाजार का विज्ञापन। दो हजार चौदह तक स्थिति ठीक थी। फिर दो बड़ी घटनाएं हुईं। जियो के आने के बाद इंटरनेट लगभग फ्री हो गया। खबरें मोबाइल पर फ्री में मिलने लगीं। लोगों ने अखबार खरीदना कम कर दिया।
जिस अखबार की पचास हजार कॉपी छपती थी, वह पंद्रह हजार पर आ गया। लेकिन कागज का दाम तीन गुना बढ़ गया, स्याही, प्लेट और डीजल का खर्च दोगुना हो गया। पांच रुपये का अखबार बीस रुपये में छाप कर बेचना पड़ रहा है। दूसरी घटना यह हुई कि विज्ञापन का पूरा खेल गूगल और मेटा खा गए।
पहले छोटा व्यापारी भी अपने कस्बे के अखबार में विज्ञापन देता था। अब वही पैसा वह फेसबुक पर सौ रुपये में बूस्ट कर देता है। सरकारी विज्ञापन अब केवल बड़े नेटवर्क और अपने चहेते अखबारों को मिलता है। स्वतंत्र, छोटा, स्थानीय अखबार इस दौड़
से बाहर हो गया। नतीजा यह हुआ कि जो अखबार किसी पार्टी या पूंजीपति का मुखपत्र नहीं बनना चाहता, उसके पास अपनी प्रिंटिंग मशीन का बिजली बिल भरने के भी पैसे नहीं बचे।
बहुत से पुराने पत्रकार इसे पत्रकारिता की मौत मानते हैं। वे कहते हैं, हम खबर बेचते हैं, भीख नहीं मांगते। लेकिन दुनिया में देखिए। द गार्जियन, विकिपीडिया, द वायर, स्क्रॉल, न्यूजलॉन्ड्री जैसे सैकड़ों संस्थान इसी मॉडल पर चल रहे हैं। वहां इसे रीडर फंडेड जर्नलिज्म कहते हैं। सिद्धांत साफ है, अगर खबर फ्री में पढ़ोगे तो खबर का सौदागर कोई और होगा। अगर तुम पैसा दोगे तो अखबार तुम्हारा होगा।
इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत है स्वतंत्रता। जब एक नेता पांच लाख का विज्ञापन देता है तो संपादक उसकी खबर नहीं छाप पाता। लेकिन जब दस हजार पाठक सौ-सौ रुपये देते हैं तो किसी एक की हिम्मत नहीं कि वह कहे कि मेरी खबर छापो। पाठक का पैसा सबसे पवित्र होता है, क्योंकि उसमें एहसान नहीं, भरोसा होता है। लेकिन इसमें खतरा भी कम नहीं है।
पहला खतरा भरोसे का संकट है। आज देश में एक लाख से ज्यादा पोर्टल और अखबार QR कोड लगा रहे हैं। पाठक किसे दे, किसे न दे? अगर पैसा लेकर भी वही कॉपी-पेस्ट खबर छापी, वही झूठ परोसा तो पाठक दूसरी बार पैसा नहीं देगा। दूसरा खतरा पत्रकारिता के एनजीओकरण का है। जब अखबार चंदे पर चलेगा तो वह हर महीने चंदा कैसे मांगेगा? भावुक अपील करेगा, रोएगा।
धीरे-धीरे खबर से ज्यादा अपील बड़ी हो जाएगी। अखबार, अखबार नहीं, एक ट्रस्ट बन जाएगा। तीसरा खतरा सरकार की चाल का है। सरकार पहले ही कहती है कि ये तो दुकान है। अब वह कहेगी कि देखो, ये तो भिखारी हैं, इन्हें सरकारी विज्ञापन क्यों दें? इस तरह छोटे अखबारों को सिस्टम से और काट दिया जाएगा।
मैं चालीस साल से इस पेशे में हूं। टाइपराइटर से लेकर एआई तक देखा है। मेरे हिसाब से अब तीन काम करने होंगे। अगर आप पाठक से सौ रुपये ले रहे हैं तो बताइए कि उस पैसे से क्या किया। हर तीन महीने में एक रिपोर्ट छापिए, कितना पैसा आया, कितना कागज पर लगा, कितना रिपोर्टर को दिया।
विदेश में द गार्जियन यही करता है, इसलिए लोग उसे पैसा देते हैं। सिर्फ प्रेस की आजादी बचाओ का नारा लगाने से कोई पैसा नहीं देगा। आजादी किसके लिए? अगर आप वही खबर छाप रहे हैं जो आईटी सेल व्हाट्सएप पर भेज रहा है तो पाठक क्यों पैसा दे? खबर ऐसी हो कि जो गली-मोहल्ले की हो, जो थाने में न लिखी जा रही हो, जो किसी बड़े चैनल पर नहीं है।
जमीनी खबर होगी तो पैसा खुद आएगा। और भारत सरकार को छोटे और मझोले समाचार पत्रों के लिए एक स्वतंत्र प्रेस फंड बनाना चाहिए, जैसा किसान के लिए होता है। जिसमें विज्ञापन का एक हिस्सा सिर्फ उन अखबारों को मिले जो पच्चीस साल से ज्यादा से छप रहे हैं और जिनका मालिक कोई बड़ी कंपनी नहीं है।
आखिरी बात साफ कहूंगा। QR कोड लगाना शर्म की बात नहीं है। शर्म की बात यह है कि पत्रकारिता बिक जाए और फिर भी QR कोड लगा कर ईमानदारी का ढोंग करे। अगर हाथ फैलाना ही है तो उस हाथ में कलम मजबूती से होनी चाहिए।
पाठक का दस रुपया भी तभी इज्जत है जब उससे लिखी गई खबर में सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत हो। वरना यह सहयोग नहीं, सुपारी बन जाएगा। प्रेस को बचाने के लिए पैसा चाहिए, लेकिन पैसा ही प्रेस को नहीं बचा सकता। प्रेस को बचाएगी तो सिर्फ उसकी साख, उसकी जमीनी रिपोर्ट और पाठक का टूटता हुआ वो भरोसा जो कहता है, हां, अभी भी कोई है जो मेरे लिए लिख रहा है।