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इंदौर का शास्त्री ब्रिज पुल बना इंदौर की रीढ़ की हड्डी जिसने संभाला 1953 से आज तक का ट्रैफिक

अंधेर नगरी न्यूज वेबसाइट इंदौर। संजय सोलंकी की कलम से।शास्त्री ब्रिज का यह दुर्लभ चित्र इसके उद्घाटन के समय का है जिसमें होलकर कॉलेज की बस जाते हुए दिखाई दे रही है।इंदौर शहर का पहला रेलवे फ्लाईओवर 12 जनवरी 1953 में बनकर तैयार हुआ था। जिसका विधिवत उद्घाटन परिवहन मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने…

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अंधेर नगरी न्यूज वेबसाइट इंदौर। संजय सोलंकी की कलम से।शास्त्री ब्रिज का यह दुर्लभ चित्र इसके उद्घाटन के समय का है जिसमें होलकर कॉलेज की बस जाते हुए दिखाई दे रही है।इंदौर शहर का पहला रेलवे फ्लाईओवर 12 जनवरी 1953 में बनकर तैयार हुआ था।

जिसका विधिवत उद्घाटन परिवहन मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने किया था इसी वजह से इस ब्रिज का नाम शास्त्री पुल पड़ा।

इस ब्रिज ने इंदौर शहर की रीड का काम किया जिसने इंदौर शहर की ट्राफिक को कई दशकों तक संभाला। यहां ब्रिज का निर्माण मध्यभारत की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक था।

50 -60 के दशक मे इस ब्रिज के यहां से दिन भर में गिनती की ही कारे निकला करती थी अमूमन इंदौर शहर के शास्त्री ब्रिज का ट्रैफिक 50 के दशक में साइकिले तांगे एवं बैलगाड़ियों गुजारा करती थी।

ट्रैफिक बड़ा सुगम एवं प्रदूषण मुक्त था। शास्त्री ब्रिज के ऊपरी भाग पर संगमरमर का एक बोर्ड लगा होता था जिस पर लिखा था “लाल बहादुर शास्त्री पुल” यहां संगमरमर का पत्थर यहां से गायब है लेकिन इसका मेटल का फ्रेम आज भी मौजूद है।

निर्माण और इतिहास: एक मजबूत नींव इंदौर रेलवे लाइन के ऊपर बने इस पुल की लंबाई लगभग 500 मीटर है, और यह चार लेन वाला है। उस समय की इंजीनियरिंग का कमाल, यह ब्रिज प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट तकनीक से बना था, जो भूकंप और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं को झेलने में सक्षम है।

निर्माण के पीछे की कहानी दिलचस्प है। 1960 के दशक में इंदौर तेजी से फैल रहा था। पुराना विजय नगर पुल ट्रैफिक की बढ़ती मांग को संभाल नहीं पा रहा था। शास्त्री ब्रिज ने न केवल यातायात की समस्या सुलझाई, बल्कि शहर को दो हिस्सों – पुराने इंदौर और नए विकास क्षेत्रों – में जोड़कर एकीकृत किया।

आज यह इंदौर के इतिहास का जीता-जागता हिस्सा है, जो शहर की विकास यात्रा की गवाही देता है।

यातायात की जीवनरेखा: दैनिक आवागमन का केंद्र

शास्त्री ब्रिज इंदौर की यातायात व्यवस्था की रीढ़ है। हर दिन औसतन 1.5 लाख से अधिक वाहन इस पुल से गुजरते हैं – कारें, बसें, ट्रक और दोपहिया वाहन।

यह ब्रिज विजय नगर, पलासिया, एबी रोड और एमजी रोड जैसे प्रमुख क्षेत्रों को जोड़ता है।

सुबह की भीड़भाड़ वाली घंटियों में यह पुल शहर की नसों की तरह धड़कता है, जहां हजारों लोग काम, स्कूल या बाजार के लिए निकलते हैं।ट्रैफिक राहत: बिना इस ब्रिज के इंदौर का ट्रैफिक जाम एक भयावह सपना होता।

यह वैकल्पिक रूट्स जैसे खजराना या बिचोली मर्दाना को सपोर्ट करता है।आर्थिक महत्व: ब्रिज के आसपास के इलाके जैसे सियागंज,राजवाड़ा,हाईकोर्ट पलासिया में व्यापार फल फूल रहा है , वैसे ही पलासिया के पास अस्पताल और ऑफिस कॉम्प्लेक्स फल-फूल रहे हैं।

ट्रक यहां से माल ढोकर इंदौर को मध्य भारत का व्यापारिक हब बनाते हैं।सार्वजनिक परिवहन: बसें, ऑटो और ई-रिक्शा इस पुल पर निर्भर हैं, जो आम आदमी की जेब पर बोझ कम करते हैं।

2023 में किए गए एक सर्वे के अनुसार, शास्त्री ब्रिज ने इंदौर के जीडीपी में अप्रत्यक्ष रूप से 15-20% योगदान दिया है, क्योंकि यह लॉजिस्टिक्स और कम्यूटिंग को सुगम बनाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका: लोगों को जोड़ना

ब्रिज सिर्फ वाहनों का नहीं, लोगों का भी पुल है। यह ओ पुल हे जो इंदौर के 2 भागों को जोड़ता हे और एक बनाता है शाम के समय यहां सैर करने वाले परिवार, जॉगिंग करने वाले युवा और स्ट्रीट फूड के शौकीन मिलते हैं।

यह ब्रिज इंदौर की विविधता का प्रतीक भी है। एक तरफ पुराना शहर की मस्जिदें और मंदिर, दूसरी तरफ आधुनिक अपार्टमेंट्स – शास्त्री ब्रिज इन सबको एक सूत्र में पिरोता है। कोविड-19 महामारी के दौरान यह ब्रिज आवश्यक सेवाओं (जैसे एम्बुलेंस और सप्लाई ट्रक) की लाइफलाइन बना रहा।

चुनौतियां और भविष्य: मजबूती बनाए रखनाहर रीढ़ की हड्डी की तरह, शास्त्री ब्रिज भी चुनौतियों का सामना करता है। बढ़ता ट्रैफिक, बारिश में जलभराव और पुरानी संरचना की मरम्मत जरूरी है। लेकिन इसके रखरखाव के लिए जन जागरूकता जरूरी है – जैसे वाहनों की ओवरलोडिंग रोकना और प्रदूषण कम करना।

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