प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा की शान्ति और सद्गति के लिये शास्त्रों में कुछ पुण्य कार्य करने का विधान है। जब शरीर शान्त हो जाय तो उसे अंत्येष्टि संस्कार विधि के अनुसार वेद मंत्रों के साथ घी तथा सुगन्धित द्रव्यों की आहुतियां देते हुये अग्नि संस्कार किया जाय।
पिण्डदान, तर्पण आदि क्रियाओं के साथ -साथ श्राद्ध करके गृह शुद्धि का भी विधान है। इसके अतिरिक्त ऐसे कार्यों के लिए कुछ दान, पुण्य किया जाय l जिससे धर्म भावनाओं की वृद्धि तथा दीन दुखियों की सेवा होती है।ऐसे दान पुण्य में समाज सेवी, लोकहित में संलग्न, अपरिग्रही तथा ब्रह्मपरायण साधु संतों को भोजन भी कराया जा सकता है l
क्योंकि जिन लोगों ने अपना सारा जीवन समाज सेवा के लिए उत्सर्ग किया हुआ है, जिन्हे अपनी कोई आजीविका न रखकर अपरिग्रही बनकर ईश्वरेच्छा पर अपनी निर्वाह व्यवस्था अवलंबित रखी है, उन देव मानवों को भोजन वस्त्र आदि देना समाज का कर्तव्य है। यह कर्त्तव्य पालन धर्म या पुण्य भी कहलाता है।
ऐसे अधिकारी सत्पात्र साधु को मृतक श्राद्ध के समय तथा अन्यान्य सभी पुण्य अवसरों पर भोजन वस्त्र आदि के रूप में सहयोग देने का विधान है।मृतक श्राद्ध का धर्मकृत्य इतने ही कर्म-काण्ड के साथ सम्पन्न हो जाता है। हालांकि अंत्येष्टि संस्कार के बाद कुछ भी करने की कोई अनिवार्यता नहीं है।
अपनी शक्ति, सामर्थ्य और परिस्थिति के अनुसार इस क्रिया कर्म को पूर्ण करना उचित है। पर आज ‘‘मृतक भोज’’ नाम में एक ऐसी कुरीति चल पड़ी है जिसका उपरोक्त धर्मकृत्य से कोई सम्बन्ध नहीं है।
होता यह है कि किसी व्यक्ति के मर जाने पर उसकी तेरहवीं के दिन या वर्षी के दिन बड़ी-बड़ी विशाल भोज, भंडारों ,ब्रह्म भोज आदि का आयोजन किया जाता है,जिसमें भारी संख्या में लोग मिठाई, मालपुआ तथा भोज खाने तथा उड़ाने आते हैं। इस प्रीतिभोज कोदेखकर साधारणतः यही अनुमान होता है कि इस परिवार में कोई बड़ी उत्साहवर्धक, आनन्ददायक, लाभकारी घटना घटित हुई है. जिससे प्रसन्न होकर इतना बड़ा हर्ष-उत्सव मनाया जा रहा है। साथ ही यह भी अनुमान होता है कि यह लोग कोई बहुत बड़े अमीर हैं।
इनके पास इनकी आवश्यकताओं से अधिक बहुत-सा निरुपयोगी धन बचा पड़ा है, जिसका कोई उपयोग न देखकर भोज के बहाने समाप्त किया जा रहा हैl क्योंकि आम रिवाज के अनुसार दावतें एक प्रकार की सामाजिक विलासिता मानी जाती हैं। जिनमें आवश्यकता से अधिक धन एकत्रित हो जाने पर उसे यार, दोस्तों के बीच हंसी-खुशी के वातावरण में खा पीकर समाप्त कर दिया जाता है।
देखा गया है कि ‘‘मृतक भोज’’ इन दो कारणों से नहीं होते। न तो किसी की मृत्यु होना ऐसे हर्ष की बात है कि उसके घर वाले आनन्द मनावें और खुशी की दावतें दें और न उनके घर में इतना अनावश्यक धन ही भरा होता है कि उसे लुटाये बिना काम न चलता हो। शास्त्रीय विधान की दृष्टि से देखा जाय तो भी यह ‘‘मृतक भोज’’ उस सीमा में बिलकुल नहीं आता है. क्योंकि इन दावतों में ऐसे सत्पात्र साधु, संतों, समाजसेवियों के तो दर्शन भी दुर्लभ होते हैं, जिन्हें खिलाने में धर्म-सेवा होती हो। वैसे अब लोग ढूंढ़े भी नहीं मिलते।
साधु के नाम पर आजीविका कमाने वाले कुछ वेशधारी, नामधारी लोग तो बहुत हैं l पर उन महान कर्तव्यों में संलग्न होने के कारण अपनी पात्रता सिद्ध करने वाले ब्रह्म परायण व्यक्ति कहां हैं?और जब तक भोजन कराने के लिए उस श्रेणी के लोग न मिले तब तक ‘‘ब्रह्मभोज’’ शब्द सार्थक नहीं हो सकता।पर इन मृतक भोजों में उन नामधारी साधुओं की संख्या भी बहुत कम होती है।
इसमें तो यार-दोस्त, परिचित, व्यवहारी, रिश्तेदार आदि लोगों की भरमार होती है जिनके यहां हम भोज खाने जाते हैं, उनका बदला चुकाने के लिए या दूसरों को अपने घर में भोज खिलाने तथा देने में गर्व और प्रशंसा अनुभव करने के उद्देश्य से यह भोज दी जाती हैं,और इनमें शास्त्र विधान का कोई दृष्टिकोण न रहकर एक कुरीति और अन्ध परम्परा के रूप में ही लकीर पीटी जाती है।
चूंकि दूसरे लोग अपने बाप के मरने पर इतनी बड़ी दावत दे चुके हैं तो हमें भी वैसा ही करके अपनी बात उससे छोटी क्यों करनी चाहिए आमतौर से यही दृष्टिकोण रहता है। एक दूसरे की देखा-देखी अपने को एक-दूसरे से अधिक बड़ा आदमी अमीर और खुले हाथ लुटाने वाला उदारमना सिद्ध करने के लिए यह आयोजन किये जाते हैं, और इनमें इतना धन खर्च कर बैठते हैं कि कई साधारण परिवारों की तो आर्थिक दृष्टि से कमर ही टूट जाती है।
चन्द अमीरों की बात जाने दीजिए, हमारे देश में आम लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत दुर्बल होती है। स्वास्थ्य को कायम रखने के लिए जितना दूध घी मिलना चाहिए उतना किस परिवार को मिलता है?
बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए जितना पैसा चाहिए उतना कौन परिवार जुटा पाता है? छोटे बच्चे जब समर्थ हो जाते हैं तो उन्हें कुछ काम धन्धा करने के लिए पूंजी के अभाव में नौकरी कराने के लिए विवश होना पड़ता है। यदि नौकरी सरकारी है, तो उसमें बदली होती रहती है, और माता-पिता जो अपने बालकों के बड़े होने पर उनके साथ हिलमिल कर दिन काटना चाहते हों, अपने मनोरथ पूर्ण नहीं कर पाते।
नौकरी सम्मिलित परिवार के स्वर्गीय आनन्द की परम्परा को जीवित नहीं रहने देती। आर्थिक विवशता के अभिशापों में सर्वसाधारण का जीवन कितना अव्यवस्थित, अभावग्रस्त एवं अविकसित रह जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है।
मृतक भोज को किसी भी कसौटी पर कसा जाय वह हर दृष्टि से व्यर्थ और निरुपयोगी ही नहीं—हानिकारक एवं अशोभनीय भी सिद्ध होता है।
क्या घर के किसी व्यक्ति का मर जाना ऐसे आनन्द की बात हो सकती है, जिसकी खुशी में भोज के नाम पर दौलत उड़ाई जाय? भोज आमतौर से खुशी के अवसरों पर दी जाती हैं, संसार भर में यह एक ही परम्परा है ,फिर किसी की मृत्यु होना—विशेषतया अपने प्रियजनों की मृत्यु होना भला किस प्रकार ऐसा हर्ष का अवसर माना जा सकता है, जिसमें भोज देना आवश्यक हो?
कई बार तो ऐसा होता है कि घर का कोई कमाऊ आदमी—जवान अवस्था में अपने आश्रितों को भारी वेदना और आर्थिक समस्याओं में डालकर स्वर्गवासी हो जाता है, उसके आश्रितों को न केवल वियोग जन्य पीड़ा सहनी पड़ती है, वरन् भविष्य की आर्थिक चिन्ता से भयभीत होना पड़ता है।
ऐसी परिस्थितियों में भी कुचलित परम्परा के अनुसार मृतक भोज करना पड़ता है, जिसके कारण घर के थाली बर्तन भी बिक जाते हैं, कर्ज हो जाता हैं और थोड़े दिनों के लिये काम दे सकने लायक जो कुछ बचा कुचा था, वह भी समाप्त हो जाने पर आंसू सूखने से पहले ही भारी अर्थ संकट मुंह फाड़कर सामने आ खड़ा होता है। ऐसी विषम परिस्थिति उत्पन्न करने वाली प्रथा परम्परा किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती। उसका अन्त जितनी जल्दी हो जाय, उतना ही उत्तम है।
कई व्यक्ति अपने मन को समझाने के लिए ऐसा सोचते हैं कि इस मृतक भोज से स्वर्गीय आत्मा को कोई पुण्यफल प्राप्त होगा। यह धारणा सर्वथा मिथ्या है। पुण्य उन कार्यों में होता है जिनसे किसी दीन-दुखी की सेवा हो, किसी की उचित उन्नति में सहायता मिले या समाज में धर्म भावनाएं बढ़ाने वाली सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि हो।
इन उद्देश्यों के लिए विवेकपूर्वक कुछ दान-पुण्य सत्पात्रों को किया जाय तो उसे पुण्य माना जा सकता है, उससे स्वर्गीय आत्मा को कुछ शान्ति मिल सकती है। पर मृतक भोज में जो लोग भोज खाने आते हैं , वे इस उद्देश्य की पूर्ति में किसी भी प्रकार सहायक नहीं होते। वे न तो दीन-दुःखीहोते हैं और न अपरिग्रही, लोक-सेवा, तप,साधना युक्त ब्रह्म परायण सत्पात्र साधु ही। फिर उन्हें खिलाने से कैसे पुण्य संभव होगा? जब पुण्य हुआ ही नहीं तो स्वर्गीय आत्मा को उससे मिलने वाला ही क्या है?
मृतक भोज के मूल में वही ‘‘बड़प्पन दिखाने’’ की भावना काम करती है जिससे प्रेरित होकर लोग ब्याह बरातों में अन्धाधुन्ध फिजूल खर्चा करते हैं। लोगों की एक व्यर्थ कल्पना यह है कि इस प्रकार पैसा फेंकने का खेल करने से दूसरों की आंखों में हम बड़े आदमी दिखाई देंगे।
पर यह धारणा सर्वथा भ्रमपूर्ण है। अब समझदारी का जमाना आ रहा है। इसमें इस प्रकार के ऊलजलूल काम करने वाले शेखीखोर लोग न तो बुद्धिमान माने जाते हैं और न बड़े आदमी। कोई खुशामदी या मशखरे उनके मुंह पर झूठी वाहवाही कर सकते हैं पर भीतर ही भीतर वे भी उस मूर्खता पर हंसते हैं।
पैसा बड़े परिश्रम से कमाया जाता है। उसका उपयोग केवल उन आवश्यक कार्यों में होना चाहिए जो जीवन के भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास में वस्तुतः सहायक हों। शान शौकत, वाहवाही, बड़प्पन के लिए पैसा फेंकने वाले लोग समझदार लोगों की दृष्टि में सिर्फ अहमक ही समझे जा सकते हैं।
वस्तुतः बात भी ऐसी है—जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं की उपेक्षा करके इस प्रकार के व्यर्थ कामों में धन की बर्बादी करना किसी भी प्रकार उचित नहीं माना जा सकता।
अब समय आ गया है कि हम समझदारी से काम लें और उचित अनुचित का विचार कर उपयोगी दृष्टिकोण अपनायें।
मृतक भोज हर दृष्टि से त्याज्य है। धार्मिक कर्मकाण्ड की दृष्टि से जितना आवश्यक हो श्राद्ध कर्म कराया जा सकता है, उस अवसर पर शोक प्रकट करने आये हुए सम्बन्धी या कुटुम्बी भी साथ-साथ खाना खा सकते हैं पर दावत के रूप में मृतक भोज बिलकुल न किया जाय, यही उचित है।
पंजाब ओर राजस्थान में यह रिवाज है कि तेरहवीं श्राद्ध के दिन सभी मित्र सज्जन, कुटुम्बी रिश्तेदार इकट्ठे होते हैं और मृतक के आश्रितों की आर्थिक सहायता के लिए अपना-अपना कर्तव्य पालन करते हैं कि उन्हें धैर्य, साहस और आगे के लिए किस प्रकार व्यवस्था करनी चाहिए.
इसके लिए आवश्यक सलाह और सहयोग देते हैं। यह तरीका बुद्धिमत्ता का है। यदि हम यह न कर सकें तो किसी गरीब को बर्बाद करने के लिए मृतक भोज की भोजन करने के लिए भार तो न बनें। उन दुःखी और परेशान लोगों के यहां जिनके आंसू भी सूख नहीं पाये हैं की भोज खाने जाना, सचमुच ही बड़ा घटिया दर्जे का काम है, इसे करने के लिए किसी सहृदय व्यक्ति को कदापि तैयार नहीं होना चाहिए।
श्रेष्ठ पुरुषों का हृदय तो दूसरों को दुखी देखकर पिघल जाता है और वे उनके दुःख को दूर करने का प्रयत्न करते हैं। उनके दुःख को अपना ही दुःख समझने लगते हैं। यदि दुखिया की सहायता न की, जिसके घर में मृत्यु हुई है, उसका समस्त परिवार उसके वियोग में शोकग्रस्त है, वहां भोजन तथा मिठाईयां खाने की बात सोचना या उसको ऐसी सलाह देना बहुत ही गलत बात है।
यह तो उनके ताजे जख्मों पर नमक छिड़कने की तरह है। मातम में इस प्रकार की भोज से होने वाले दुःख का अनुमान तो तब हो सकता है जब हमारे स्वयं के घर में ऐसी स्थिति हो, मन बैठा हुआ हो, धन का अभाव हो। कर्ज लेना पड़ रहा हो। उस समय इस कुप्रथा के विरुद्ध दो खरी खोटी सुनाने के लिए तैयार हो जायेंगे।
जीभ के क्षणिक स्वाद के लिए मृतक के घर में भोज खाने जाना या उनको इसके लिए बाध्य करना मनुष्यता से गिर जाने के बराबर है। हमारा कर्तव्य तो यह है कि सान्त्वना देते हुए, उनकी आर्थिक सहायता करें।
हमें चाहिए की मृतक भोजों में भोज खाने के लिए न जाने की प्रतिज्ञा लें। दूसरों को भी ऐसी ही सलाह दें। जिनके
यहां मृत्यु हो गई हो उन्हें,
आवश्यक धार्मिक कर्मकाण्ड से आगे न बढ़ने की बात समझावें। श्राद्ध कर्म में जाने को अब तो सब सगे संबंधी भी तैयार नहीं होते। उस अन्न को खाने पर धर्मावलंबी ईश्वर भक्त को भी पाप लगता है तो फिर साधारण लोग उस मृतक भोज के अन्न का प्रायश्चित कैसे कर पायेंगे? जो न कोई साधु हैं और न ही कोई धर्मनिष्ठ, जो उसका प्रायश्चित ही कर सकते हैं, वे भी यह मृतक भोज खाने जाते हैं तो एक भारी भूल करते हैं। यह भूल उनके लोक और परलोक को बिगाड़ने वाली ही सिद्ध हो सकती है। मृतक भोज हर दृष्टि से त्याज्य है। इसे छोड़ने के लिए आवश्यक वातावरण बनाना प्रत्येक विवेकशील एवं धर्म प्रेमी का कर्तव्य है
अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा हैं l
अपने विचारों को सशक्त रूप से रखने के लिए आवश्यक है कि हमें विषय की गहन जानकारी हो, तभी हम पूर्ण आश्वस्त होंगे एवं स्वयं के जीवन में उतारने के लिए संकल्पित भी होंगे।
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएंगे, तो समाज अवश्य बदलेगा। दूसरों को श्रेष्ठ बनाने और संकल्पित होने के लिए आप इस संदेश को अपने कुटुम्बियों, परिचितों से साझा करें।
जैसे ही आप इस लेख को दूसरों से साझा करेंगे तो इसका सीधा सा यही अर्थ होगा कि:-आप मृतकभोज में न सम्मलित होने के लिए संकल्पित हैं। (पहला कार्य यही करें। यदि मृतकभोज में जाना भी पड़े तो भोजन न करें l) इससे यह लाभ होगा कि आपके विचार से सभी परिचित हो जाएंगे और आपको इस कुप्रथा को मानने के लिए बाध्य नही करेंगे।

























