बिहार राजनीति शिक्षा

राजनीतिक गलियारों में बिहार पंचायत चुनाव की सरगर्मी

प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

बिहार में नियम के अनुसार नवंबर – दिसंबर 2026 में 10 चरणों में पद मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, वार्ड सदस्य, पंच के कुल 2.5 लाख से ज्यादा जनप्रतिनिधि चुने जायेंगे l

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव ने गांव से लेकर शहर तक राजनीति के गलियारों में हलचल बढ़ा दी हैं l राज्य निर्वाचन आयोग ने अभी भले ही चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं की हैं, लेकिन गांव -गांव में चौपाल सजने लगी हैं l चाय की दुकानों, पंचायत चौपालों और खेतों के किनारों पर अब सिर्फ फसल और महंगाई की नहीं, बल्कि प्रधान बनने की रणनीतियों की बातें हो रहीं हैं l प्रदेश में पंचायत चुनाव हमेशा से ही सामाजिक और राजनीतिक चर्चा का केन्द्र रहें हैं।

पंचायत चुनाव की महत्ता की बात की जाये तो पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य गांव का शासन गांव के हाथ में था l एक तरफ गांव में चौपालें सज रहीं हैं तो दूसरी तरफ इस बार त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बदली हुई आरक्षण की व्यवस्था लागू होने की सुगबुगाहट के चलते चुनाव लड़ने के इच्छुक कई नेताओं तथा उम्मीदवारों की परेशानियों बल पड़ गए हैं।

बिहार पंचायत चुनाव 2026: बदलता गणित, नई उम्मीदें

भूमिका- लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव ग्राम पंचायतों को माना जाता है। बिहार में नवंबर-दिसंबर 2026 में होने वाले पंचायत चुनाव सिर्फ मुखिया या सरपंच चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि गांव की सरकार बनाने का महापर्व है। इस बार चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाला है।

1. इस बार क्या है खास

पहली बार EVM से वोटिंग

आजादी के बाद से बिहार में पंचायत चुनाव बैलेट पेपर से होते आए हैं। 2026 में पहली बार

मल्टी पोस्ट EVM का इस्तेमाल होगा। एक ही कंट्रोल यूनिट से 6 बैलेट यूनिट जुड़ी होंगी, जिससे मतदाता एक जगह पर ही मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य, पंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य के लिए वोट डाल सकेंगे। इससे काउंटिंग तेज होगी और धांधली की गुंजाइश कम होगी।

आरक्षण रोस्टर का पूरा गणित बदलेगा

बिहार में रोटेशन सिस्टम लागू है। एक सीट पर लगातार दो चुनाव तक ही आरक्षण रहता है। 2026 में तीसरा चक्र शुरू होगा। इसका मतलब:- पिछले दो चुनाव में आरक्षित सीटें अब सामान्य होंगी- अब तक सामान्य रही सीटों पर आरक्षण लागू होगाइससे गांव-गांव का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा। नए चेहरों को मौका मिलेगा।

डिजिटल हो रहा चुनाव

प्रपत्र-1 से लेकर आरक्षण रोस्टर तक सब कुछ डिजिटली तैयार होगा। 2011 की जनगणना के आधार पर आबादी तय की जाएगी। नए नगर निकाय बने इलाकों में फिर से डेमोग्राफी सर्वे होगा।

2. चुनाव की तैयारी का शेड्यूल

राज्य निर्वाचन आयोग ने तैयारी शुरू कर दी है:- *DM को जिम्मेदारी*: हर जिले के DM को जिला निर्वाचन पदाधिकारी बनाया गया- *अफसरों की ट्रेनिंग*: 12 अप्रैल से पटना, तिरहुत प्रमंडल में शुरू।

16-17 अप्रैल से मगध, भागलपुर, मुंगेर, पूर्णिया, कोसी, दरभंगा, सारण में- *आरक्षण ड्राफ्ट*: 27 अप्रैल को प्रारूप प्रकाशित होगा, 29 मई को फाइनल रोस्टर-

वोटर लिस्ट: जून 2026 में नई मतदाता सूची बनेगी-

वोटिंग: नवंबर-दिसंबर 2026 में संभावित

3. आरक्षण व्यवस्था का इतिहास

बिहार में पंचायतों में आरक्षण 2006 से लागू है।- 2006 और 2011: पहला चक्र- 2016 और 2021: दूसरा चक्र- 2026: तीसरा चक्र शुरूइस व्यवस्था का मकसद सभी वर्गों को समान अवसर देना है। रोटेशन से यह सुनिश्चित होता है कि कोई सीट हमेशा के लिए आरक्षित न रहे।

4. चुनौतियां और अवसर

चुनौतियां: EVM की ट्रेनिंग, ग्रामीण वोटरों को जागरूक करना, नए आरक्षण से पैदा होने वाला असंतोष।

अवसर: पारदर्शी चुनाव, तेज नतीजे, युवा और महिलाओं की भागीदारी बढ़ने की संभावना। बदले आरक्षण से नए नेतृत्व का उभरना तय है।

निष्कर्ष

बिहार पंचायत चुनाव 2026 सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है। EVM, डिजिटल रोस्टर और बदले आरक्षण के साथ ये ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने का मौका है। गांव की सरकार कैसी बनेगी, विकास की दिशा क्या होगी – ये फैसला अब जनता की EVM पर उंगली से होगा।

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