राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी की जमीन पर पांच शिलान्यासों की काली छाया
राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी की जमीन पर पांच शिलान्यासों की काली छाया
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
मधुबनी जिले के राजनगर में एक ऐसी जमीन है जिसे इस कस्बे के लोग ज्ञान की जमीन कहते हैं। यह जमीन 1931 में वासुदेव राम संस्कृति भवन सह पब्लिक लाइब्रेरी के नाम पर स्थापित हुई थी। इसी जमीन का खेसरा संख्या 988, 989 और 990 है।
27 अगस्त 2026 को उसी जमीन पर एक नया बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना से बैठक हॉल निर्माण, शिलान्यास माननीय विधान पार्षद सर्वेश कुमार द्वारा दिनांक सत्ताईस अगस्त दो हजार छब्बीस। यह बोर्ड इसी प्रांगण में थोड़ा हट कर पीछे की खाली जगह पर लगाया गया है जबकि सामने मुख्य भवन पर आज भी 16.07.1986 उन्नीस और 14.05.1990 की सरकारी पट्टिकाएं लगी हुई हैं।
बात सिर्फ एक पट्टिका की नहीं है। इसी एक ही जमीन पर आज तक पांच बार शिलान्यास हो चुका है। उन्नीस सौ इकतीस में पहला संस्कृति भवन के नाम पर, उन्नीस सौ नब्बे में मंत्री रमई राम के द्वारा पुस्तकालय भवन के नाम पर, उन्नीस सौ छियासी में बीडीओ रति कान्त झा के द्वारा ग्रामीण रोजगार
योजना से भवन निर्माण के नाम पर, दो हजार पाँच में विधायक रामदेव महतो के द्वारा नाट्य परिषद का नव निर्माण के नाम पर और अब दो हजार छब्बीस में उसी प्रांगण में बैठक हॉल के नाम पर। जमीन एक ही है लेकिन हर बार पट्टिका बदल कर उसी जमीन को नया दिखाने की कोशिश की गई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिलान्यास पीछे क्यों किया गया सामने क्यों नहीं। इसका कारण साफ है। सामने मुख्य भवन पर पुरानी सरकारी पट्टिकाएं लगी हैं। अगर वहीं नया शिलान्यास होता तो जनता तुरंत पूछती कि पहले की चार पट्टिकाओं का क्या हुआ और जर्जर पड़े पुस्तकालय की मरम्मत क्यों नहीं हुई।
इसलिए नया शिलान्यास पीछे की खाली जगह पर कर दिया गया ताकि कागज पर यह दिखाया जा सके कि यह खाली सरकारी जमीन पर नया निर्माण है और शिक्षा विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। जबकि नियम यह कहता है कि खेसरा 988, 989, 990 जो पुस्तकालय के नाम पर दर्ज है,
उस पर किसी भी निर्माण के लिए जिला शिक्षा पदाधिकारी मधुबनी से अनुमति लेना अनिवार्य है। ग्रामीण कार्य विभाग प्रमंडल दो झंझारपुर को कार्यकारी एजेंसी बना कर सीधे निर्माण शुरू करा दिया गया।
राजनगर के लोगों का मानना है कि यह सिर्फ बैठक हॉल का मामला नहीं है। यह पूरे पुस्तकालय प्रांगण को हड़पने की पटकथा है। उन्नीस सौ इकतीस वाला मूल नीला भवन वर्षों से ताला बंद पड़ा है,सिर्फ कभी-कभी कार्यक्रम होता हैं l
अंदर किताबें सड़ रही हैं, कोई पाठक नहीं आता। उसे ठीक करने के बजाय उसी के प्रांगण की बची हुई खाली जमीन पर नया हॉल बना कर धीरे धीरे पूरे रकवा को सांस्कृतिक परिसर के नाम पर एक निजी कमेटी के हवाले करने की तैयारी चल रही है। आज बैठक हॉल बनेगा कल कार्यालय बनेगा और परसों पूरा पुस्तकालय ही खत्म हो जाएगा।
इसलिए अब जरूरत है कि अंचल कार्यालय राजनगर खेसरा 988, 989, 990 का पूरा खतियान और नक्शा सार्वजनिक करे। यह बताए कि यह जमीन किस विभाग के नाम पर दर्ज है और इस पर हुए नए शिलान्यास के लिए शिक्षा विभाग से अनुमति ली गई है या नहीं। साथ ही उन्नीस सौ इकतीस के जर्जर
संस्कृतिक भवन की मरम्मत को प्राथमिकता दी जाए न कि उसी प्रांगण में नया निर्माण कर पुराने पुस्तकालय को हमेशा के लिए दफन कर दिया जाए। राजनगर की यह लाइब्रेरी सिर्फ ईंट पत्थर का भवन नहीं है, यह इस इलाके के छात्रों के भविष्य की जगह है। अगर यह जमीन चली गई तो राजनगर में किताब के लिए कोई जगह नहीं बचेगी।