शाहपुरा पूर्वजों की तपोभूमि, यहां की आध्यात्मिक व्यवस्था अद्भुत और अनुपम — पूज्य श्री गजेन्द्र गोपाल जी शास्त्री
शाहपुरा पूर्वजों की तपोभूमि, यहां की आध्यात्मिक व्यवस्था अद्भुत और अनुपम — पूज्य श्री गजेन्द्र गोपाल जी शास्त्री
शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक।शाहपुरा, 4 अगस्त। माहेश्वरी पंचायत भवन, सदर बाजार, शाहपुरा में आयोजित नौ दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के चतुर्थ दिवस कथावाचक गजेन्द्र गोपाल शास्त्री ने श्रद्धालुओं को सनातन संस्कृति, निष्काम भक्ति, शिव महिमा तथा शाहपुरा की आध्यात्मिक विरासत पर प्रेरणादायी उद्बोधन दिया।
कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर शिव कथा का रसपान किया तथा पूरा पांडाल “जय शंभू” के जयघोष से गुंजायमान रहा।अपने प्रवचन में शास्त्री ने कहा कि शाहपुरा केवल एक नगर नहीं, बल्कि पूर्वजों की तपस्या और आध्यात्मिक साधना की जीवंत धरोहर है। यहां के प्राचीन मंदिर,
हनुमानजी के दिव्य विग्रह, सरोवर क्षेत्र के देवस्थान तथा नगर की धार्मिक संरचना पूर्वजों की दूरदृष्टि और लोककल्याण की भावना का अद्भुत उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि देश के अनेक तीर्थों के दर्शन के बाद भी शाहपुरा जैसी आध्यात्मिक व्यवस्था अत्यंत दुर्लभ है।उन्होंने कहा कि पूर्वजों ने नगर के प्रत्येक क्षेत्र में देवस्थानों की ऐसी व्यवस्था स्थापित की, जिससे समाज में सुख, शांति और
आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार बना रहे। यदि आज समाज में विभिन्न प्रकार की विपत्तियां दिखाई देती हैं तो यह हमारी आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण और सम्मान के प्रति आत्ममंथन का विषय है।महाराज श्री ने श्रद्धालुओं से मंदिरों, देवस्थानों, संतों, ब्राह्मणों एवं गौ माता के सम्मान का आह्वान करते हुए कहा कि भगवान निर्गुण भी हैं और सगुण भी। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परंपरा के अनुसार ईश्वर की आराधना
करनी चाहिए, किंतु किसी भी स्थिति में देव, धर्म और संतों की निंदा नहीं करनी चाहिए।उन्होंने कहा कि शिव कथा का वक्ता, श्रोता और जिज्ञासापूर्वक प्रश्न पूछने वाला—तीनों तीर्थ के समान पवित्र हो जाते हैं। श्रद्धा और निष्काम भाव से शिव महापुराण का श्रवण आत्मशुद्धि का सर्वोत्तम माध्यम है।
कथा का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है जब वक्ता, श्रोता और प्रश्नकर्ता तीनों निष्काम भाव से कथा से जुड़ें।प्रवचन के अंत में पूज्य श्री शास्त्री ने श्रद्धालुओं से अपने भीतर स्थित शिव स्वरूप को पहचानने का संदेश देते हुए भावपूर्ण “जय शंभू” का उद्घोष कराया। कथा के समापन पर भगवान भोलेनाथ की आरती हुई तथा समस्त श्रद्धालुओं ने विश्व कल्याण, सुख-समृद्धि और धर्म की उन्नति के लिए प्रार्थना की।