इंदौर, 30 अक्टूबर 2025: मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में वाल्मीकि समाज की बस्ती में लगे एक पोस्टर ने सामाजिक न्याय के नाम पर फिर से पुरानी बहस को जिंदा कर दिया है। पोस्टर पर स्पष्ट रूप से “हरिजन” हरिजन मोहल्ले शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जो दलित समुदाय के लिए अब अपमानजनक माना जाता है।
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि यह पोस्टर बीजेपी समर्थित संगठन द्वारा लगाया गया, लेकिन जिला प्रशासन इस मामले पर पूरी तरह खामोश है या अभी मामला अधिकारियों तक पहुंचा ही नहीं।
क्या यह बीजेपी नेताओं का दलित वोट बैंक को लुभाने का पुराना तरीका है? या फिर सामाजिक संवेदनशीलता की कमी?
घटना का विवरण: पोस्टर जो चुभा दिल मेंइंदौर के वाल्मीकि समाज बस्ती नौलखा रोड के पास लोहा मंडी ब्रिज के एक पोल पर पिछले कुछ दिनों से एक बड़ा पोस्टर लगा हुआ है, जिसमें “हरिजन मोहल्ला ” शीर्षक के साथ सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन सूचीबद्ध है।
नाम छापने की शर्त पर एक स्थानीय निवासी ने बताया, “यह शब्द हमें नीचा दिखाने जैसा लगता है। महात्मा गांधी ने इसका इस्तेमाल किया था, अब सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश हे की इस तरह का शब्द उपयोग में लाना गैरकानूनी है और दलित इसे अपमान मानते हैं।
फिर भी, कुछ लोग इसे लगाए जा रहे हैं।” पोस्टर पर बीजेपी के स्थानीय नेताओं के नाम और फोटो भी नजर आ रहे हैं, जो इसे राजनीतिक रंग दे रहे हैं।वाल्मीकि समाज, जो खुद को महर्षि वाल्मीकि के वंशज मानता है, ने हाल ही में वाल्मीकि जयंती पर इंदौर में बड़े आयोजन किए थे।
लेकिन अब यह पोस्टर विवाद का केंद्र बन गया है। समाज के युवाओ ने कहा, “हम ‘वाल्मीकि’ या ‘दलित’ शब्द पसंद करते हैं, ‘हरिजन’ नहीं।
यह गांधी युग की देन है, जो हमें ‘भगवान के बच्चे’ कहकर पितृसत्तात्मक दृष्टि से देखता है।”बीजेपी नेताओं का ‘हरिजन’ से लगाव: क्यों नहीं छूटा पुराना नाम?’हरिजन’ शब्द का इतिहास 1930 के दशक से जुड़ा है।
महात्मा गांधी ने 1932 में दलितों को ‘भगवान के पुत्र’ कहकर इस शब्द को लोकप्रिय बनाया और ‘हरिजन’ नाम से पत्रिका भी निकाली। लेकिन डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसका कड़ा विरोध किया।
उनका मानना था कि यह शब्द हिंदू धर्म की पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूत करता है और दलितों की असल पीड़ा को छिपाता है। अंबेडकर ने ‘दलित’ या ‘दबे-कुचले वर्ग’ जैसे शब्दों को प्राथमिकता दी।बीजेपी नेताओं पर यह आरोप लगता रहा है कि वे ‘हरिजन’ शब्द से चिपके रहते हैं, खासकर दलित वोटों को साधने के लिए।
2021 में सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘हरिजन’, ‘धोबी’ जैसे शब्दों को अपमानजनक करार दिया। फिर भी, बीजेपी की कई योजनाएं और संगठन आज भी ‘हरिजन’ शब्द इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2022 में दिल्ली सरकार ने ‘हरिजन’ वाली कॉलोनियों के नाम बदलने का प्रस्ताव लाया, लेकिन बीजेपी ने इसका विरोध किया।
हाल के वर्षों में, बिहार और यूपी चुनावों से पहले बीजेपी नेताओं ने दलितों को हिंदुत्व के छत्र में लाने के प्रयास में ‘हरिजन’ का सहारा लिया। आलोचक कहते हैं कि यह हिंदू एकता का दिखावा है, लेकिन वास्तव में जातिगत भेदभाव को बनाए रखने की चाल।एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “बीजेपी का ‘हरिजन’ से लगाव इसलिए है क्योंकि यह गांधी की विरासत से जुड़ा है।
वे दलितों को मुख्यधारा में लाने का दावा करते हैं, लेकिन शब्दों से ही असंवेदनशीलता दिखाते हैं।
“प्रशासन की अनजानगी: कार्रवाई कब?
स्थानीय प्रशासन का रवैया सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। जिला कलेक्टर कार्यालय के अधिकारियों को शायद यह मामला संज्ञान में नहीं हे , इसलिए शायद आज तक कोई एक्शन नहीं लिया गया ।
यह घटना उस समय आई है जब मध्य प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां तेज हैं। दलित वोटों का बड़ा हिस्सा वाल्मीकि समाज का है, और ऐसे विवाद बीजेपी की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के स्थानीय नेता ने कहा, “यह बीजेपी की पुरानी चाल है। वे ‘हरिजन’ कहकर दलितों को नीचा दिखाते हैं, लेकिन वोट मांगते समय भूल जाते हैं।” यह घटना पूरे देश में ‘हरिजन’ शब्द की बहस को फिर से हवा दे सकती है।
क्या बीजेपी अपनी भाषा सुधारेगी, या यह विवाद चुनावी हथियार बनेगा? इंदौर की सड़कों से सवाल उठ रहा है—सामाजिक न्याय का दावा करने वाली सरकारें आखिर कब शब्दों की ताकत समझेंगी?

























