राज महिलाओं के सिर और राज कर रहे पुरुष पंचायत से लेकर संसद तक, कुर्सी महिला की और कलम पुरुष की
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार बिहार के गांवों से लेकर राज्य की राजधानी तक एक तस्वीर बहुत आम हो गई है। पंचायत भवन के बाहर नेम प्लेट पर “मुखिया जी – श्रीमती फलां देवी” लिखा मिलेगा। कार्यालय के अंदर कुर्सी पर महिला बैठी होगी, लेकिन फाइल आगे-पीछे करने वाला, सरकारी अफसरों से बात करने वाला, ठेकेदार से सौदा करने वाला कोई पुरुष होगा।
यही हमारे लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास है। राज महिलाओं के सिर पर है, पर राज सच में पुरुष कर रहे हैं। संविधान के 73वें संशोधन और बिहार में 50 प्रतिशत आरक्षण के बाद पंचायतों की शक्ल पूरी तरह बदल गई। मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य, जिला परिषद अध्यक्ष – हर तीसरी कुर्सी अब महिला के लिए आरक्षित है। आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 10 हजार से ज्यादा पंचायतों में महिलाएं मुखिया हैं। कागज पर यह क्रांति है। जमीनी हकीकत अलग कहानी कहती है।
गांव में इसे “पतिदेव मुखिया” या “सरपंच पति” कहकर ही जाना जाता है। चुनाव का प्रचार पति करता है, वोट मांगने घर-घर पति जाता है। जीतने के बाद शपथ महिला लेती है, लेकिन पंचायत की बैठक में अंतिम फैसला पति सुनाता है। सरकारी मीटिंग में महिला मुखिया बगल में बैठी रह जाती है और सारी बातचीत उनका पति या देवर करता है। बैंक में साइन के लिए अंगूठा महिला का लगता है, लेकिन चेक कौन भरेगा, किस ठेकेदार को काम मिलेगा, यह सब तय पुरुष करता है।
इसके पीछे कई वजहें हैं। पहली वजह शिक्षा और अनुभव की कमी। सदियों से राजनीति और सरकारी कामकाज से दूर रखी गई महिलाओं को अचानक पंचायत चलाने की जिम्मेदारी मिल गई। फाइलें, बजट, योजना, ऑनलाइन पोर्टल – यह सब उनके लिए नया है। ऐसे में घर का पुरुष “मद” के नाम पर पूरी कमान संभाल लेता है। दूसरी वजह सामाजिक सोच है।
आज भी कई गांवों में यह माना जाता है कि महिला बाहर जाकर अधिकारियों से नहीं मिल सकती, रात में बैठक नहीं कर सकती, ठेकेदारों से मोलभाव नहीं कर सकती। इसलिए “घर की इज्जत” बचाने के नाम पर पुरुष मोर्चा संभाल लेता है। तीसरी और सबसे कड़वी वजह सत्ता और पैसे का लालच है। पंचायत में 15वें वित्त, मनरेगा, आवास योजना का करोड़ों का बजट आता है। उस पर नियंत्रण छोड़ना कोई नहीं चाहता। नतीजा यह होता है कि आरक्षण का मकसद अधूरा रह जाता है।
आरक्षण का मकसद सिर्फ कुर्सी पर महिला को बैठाना नहीं था। मकसद था महिलाओं के मुद्दे – शौचालय, आंगनबाड़ी, स्कूल, स्वास्थ्य – को प्राथमिकता मिले। लेकिन जब निर्णय पुरुष ले रहा है तो प्राथमिकताएं भी वही रहती हैं जो पहले थीं। कई जगह तो महिला मुखिया को यह भी नहीं पता होता कि उसकी पंचायत में कौन सी योजना चल रही है। लेकिन तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है।
बिहार के ही कई जिलों में ऐसी मुखिया और सरपंच हैं जिन्होंने इस “प्रॉक्सी राज” को तोड़ा है। मधुबनी, दरभंगा, सहरसा की कई महिलाओं ने खुद पढ़ाई की, खुद मीटिंग की, खुद अधिकारियों को घेरा। शुरू में विरोध हुआ, ताने मिले, लेकिन धीरे-धीरे गांव वालों ने माना कि काम हो रहा है तो चेहरा कोई भी हो। ऐसी महिलाएं अब दूसरी महिलाओं के लिए रोल मॉडल बन रही हैं।
समाधान सिर्फ कानून बनाने से नहीं निकलेगा। जरूरत है प्रशिक्षण की। पंचायती राज विभाग को हर नई महिला जनप्रतिनिधि को 15 दिन का अनिवार्य प्रशिक्षण देना होगा। बैंकिंग, आरटीआई, सरकारी पोर्टल, बजट बनाना – यह सब सिखाना होगा। जरूरत है सुरक्षा की। ताकि कोई महिला यह कह सके कि “यह मेरी पंचायत है और फैसला मैं लूंगी” बिना डर के। और सबसे ज्यादा जरूरत है सोच बदलने की। गांव को यह समझना होगा कि वोट महिला को दिया है तो काम भी उसी से मांगना है।
लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नेम प्लेट पर जो नाम होगा, कलम भी उसी के हाथ में होगी। वरना हम 50 प्रतिशत आरक्षण का जश्न मनाते रहेंगे और हकीकत में राज वही पुराने तरीके से चलता रहेगा। कुर्सी महिला के सिर पर शोभा की चीज बनकर रह जाएगी और सत्ता की चाबी पुरुष के जेब में।
असली स्वराज तब आएगा जब “मुखिया ” कहने पर गांव वाला महिला की तरफ देखे, उसके पति की तरफ नहीं।