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आखिर पत्रकारिता की गरिमा खतरे में क्यों ? पत्रकारिता बदनाम हुआ यूट्यूबर तेरे लिए

प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार आज पत्रकारिता बदनाम हो चुकी है और उसकी अस्तित्व ख़तरे में है l प्रतिदिन खुल रहें यूट्यूब एवं..

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प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

आज पत्रकारिता बदनाम हो चुकी है और उसकी अस्तित्व ख़तरे में है l प्रतिदिन खुल रहें यूट्यूब एवं चैनलो का सरोकार इस बात से कतई नहीं है कि समाज एवं सरकार को दिशा दे सके बल्कि उसकी दखल अंदाजी बाजार एवं भ्र्ष्टाचार पर होती है lताकि वह चंद ही महीनों में मालामाल हो सके l

पत्रकार और पत्रकारिता आधुनिक युग में अपनी पहचान एवं साख को बट्टा लगाते नजर आ रही है l कल तक जिन्हें लोकतंत्र का चौथा खम्भा, समाज एवं राष्ट्र का सजक रक्षक कहाँ जाता था, वहीं लोग आज बदनाम हो रहें है l पत्रकारिता के गिरते वजूद की वजह से ही अब कई लोग पत्रकारों को महत्वहीन समझता है l

इन दिनों सैकड़ों यूट्यूबर व स्वयं घोषित पत्रकार बिहार के मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर सहित अन्य जिलों में सक्रिय है !ऐसे पत्रकार बिना बुलाएं सामाजिक, राजनीतक, धार्मिक व प्रशासनिक कार्यक्रमों में मोबाइल फ़ोन से वीडियो बनाते और थैली में न्यूज़ चैनलों जैसा माइक बूम लेकर दिखाई पड़ते हैl यही नहीं अब ऐसे किस्म के यूट्यूबर अपने स्वयं सत्यापन व हस्ताक्षर वाला प्रेस आई कार्ड भी गले में पहने दिखाई पड़ते है!

इसके आलावा यूट्यूब पर फर्जी नाम का न्यूज़ चलाने वाले अब प्रेस आई डी कार्ड बेचने का धंधा भी शुरू कर दिए है lअवैध धंधा तथा विक्रेता करने वाले में भी इनमें से कुछ लोग शामिल दिखाई देते है l वे अपने वाहनो पर प्रेस लिखकर दिनभर नियम, क़ानून की धज्जियाँ उड़ाते है!

इनके अलावा एक अच्छा खासा व्यापारी भी वर्तमान समय में कहीं न कहीं पत्रकारिता से जुडा हुआ है l कई बार समझ में नहीं आता है कि ऐसे लोगों कों क्या कहाँ व माना जाय लिए

हम उन्हें मौका का फायदा उठाने वाला धोखेबाज कहे या उधमी व्यापारी ? ऐसे फर्जी पत्रकारों द्वारा पत्रकारिता के स्तर गिरने के कारण असल पत्रकार चिंतित है l

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि स्वयं घोषित यूट्यूबर सोशल मीडिया वाले जिले के जिला व पुलिस प्रशासन समेत कई सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सा लेते है, जो कि पूर्णतः गलत है l ऐसा नहीं है कि जिला सूचना एवं जन संपर्क विभाग कों इस बात की जानकारी नहीं है lइसके बावजूद भी सरकारी कार्यक्रमों में ऐसे तथा कथित यूट्यूबर सोशल मीडिया कों अनुमति दिया जाना कई अनसुलझी सवालों को जन्म देता है l

समय रहते अगर ऐसे तथाकथित यूट्यूबर सोशल मीडिया पर जिला सुचना जन संपर्क विभाग कार्रवाई नहीं करती है तो आने वाले दिनों में इस महकमें की परेशानी बढ़ेगी!

ऐसे तथाकथित यूट्यूबर सोशल मीडिया की पहचान कराकर उन पर उचित कार्रवाई करने की जरुरत है l

केंद्र सरकार ने राज्यसभा में कहा कि देश के खिलाफ मुहिम चलाने वाले और समाज में भ्रम एवं भय फैलाने को लेकर यूट्यूब के 104 चैनलों के साथ ही ट्विटर के पांच एकाउंट और 6 वेबसाइट के खिलाफ आई टी कानून के तहत कार्रवाई की गई है। यह जानकारी सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने उच्च सदन में प्रश्नकाल के दौरान पूरक सवालों के जवाब में दी। उन्होंने कहा कि भारत सरकार देश के खिलाफ मुहिम चलाने वाले व समाज में भ्रम एवं भय फैलाने मामले में आईटी कानून की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई करती रही है।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में अब तक यूट्यूब के 104 चैनल, 45 वीडियो, फेसबुक के चार एकाउंट और दो पोस्ट, इंस्टाग्राम के तीन व ट्विटर के पांच एकाउंट और छह वेबसाइट के खिलाफ कार्रवाई की गई है। वहीं, उन्होंने कहा कि इसके साथ ही दो ऐप को भी प्रतिबंधित किया गया है।ऐसे मामलों में भारत सरकार ने संबंधित मंचों को पत्र लिखती है और वे ही कार्रवाई करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने ऐसे मामलों में कार्रवाई की है और जरूरत पड़ने पर आगे भी कार्रवाई जारी रखेगी।

मकसद बस, एक ही होता है कि ये यूट्यूबर जनता को तथा नेता को बता सके कि दरबार के ये कितने करीब है अथवा उनको किस हद तक प्रसन्न रख सकते है l किस सीमा तक सहला सकते है l देश में चौथा स्तंभ की दर्जा पत्रकार को है,वहीं पत्रकारिता के लिए उच्च शिक्षा की व्यवस्था क्यों नही? बगैर उच्च शिक्षा प्राप्त किए पत्रकारिता करने तथा उसे पत्रकार की दर्जा देना कहाँ तक उचित हैं ?

पत्रकारिता करने के लिए क्या मापदंड है? पत्रकार बनने के लिए उसकी शैक्षणिक योग्यता क्या होती? पत्रकारिता करने के लिए भी कार्ड या प्रमाणपत्र जारी होती हैं l आजकल एक मोबाइल एक माइक उस पर कुछ रुपये का स्टीकर चिपकाकर यूट्यूबर भी पत्रकार बन जाता। क्या भारत में पत्रकार बनने तथा पत्रकारिता करने के लिए इतनी ही जरूरी होती है?

पत्रकार तथा पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। जिस तरह कुकुरमुत्ते की तरह पत्रकारिता के नाम पर यूट्यूबर का खेल चल रहा है ।इससे पत्रकार तथा पत्रकारिता की गरिमा को ठेश पहुंचती हैं l पत्रकार एवं पत्रकारिता की गरिमा को पत्रकारों द्वारा ही बनाये रखा जा सकता लिए

जिस तरह का वातावरण पत्रकार के नाम पर यूट्यूबर द्वारा बनता जा रहा, लूट खसोट तथा ब्लैकमेलिंग हो रहा,यह चिंतनीय तथा चिंतन योग्य विषय है? इस विषय पर योग्य पत्रकार पत्रकारिता से जुड़े संस्थान एवं सरकार को भी चिंता करनी चाहिए l

मीडिया के गिरते वजूद की वजह से ही अब पंचायत जन प्रतिनिधि से लेकर प्रशासन भी मीडिया वालो को महत्वहीन समझने लगे है l पहले जो अधिकारी पत्रकारों को सम्मान दिया करते थे, वह अब इन्हीं चाटुकारों की वजह से नहीं मिल रहा है लिए

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि कल तक पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता था, लेकिन आज पत्रकारिता एक शुद्ध व्यवसाय बनकर उभर कर सामने आ रहा है लिए

अब जनता भी पत्रकारों कों पुलिस कि तरह ही गलत दृष्टि से देखते है l

इधर अफसरों, नेताओं, मंत्रियों, पूंजीपतियों, प्रशासनों की चमचागिरी करने की प्रवृति पत्रकारों में खूब बढ़ने लगी है!

किसी नेता तथा धनाड़य का बयान या उसकी तारीफ, किसी बैठक तथा पूजा त्यौहार या प्रोग्राम की खबर छापकर या यूट्यूब पर दिखाकर, भेजकर और उसके आगे पीछे घूमने में पत्रकारों को बहुत अच्छा लगता है l यह स्थिति स्वस्थ, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए ख़तरनाक है l विगत दिनों मधुबनी में एक सोशल मीडिया पर भ्रामक एवं तथ्यहीन खबर चलाये जाने पर नियमानुसार कार्रवाई भी किए जाने की सूचना हैं l

पत्रकारिता यूं तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है !पत्रकार वहीं होता है, जिसके सवालों में दम और बेबाक लेखनी का माहिर, निडर और बेखौफ़ हो l जो समाज को आईना दिखा सके l लेकिन, यहां तो पत्रकार नहीं बल्कि ब्लैकमेलर, दलाल, अवैध उगाही और व्यापारी की संख्या ज्यादा नजर आती है l जिनके कारण पत्रकारिता में महारत रखने वाले सम्मानित पत्रकारों को भी कभी -कभी अपमान का सामना करना पड़ जाता है l

प्रिंट मीडिया के पत्रकारों से निवेदन है कि कृपया लोगों के उस विश्वास को बनायें रखे!अपनी छवि को हमेशा बनायें रखे! नहीं तो फिर आपमें और सोशल मीडिया तथाकथित यूट्यूबर के पत्रकारों में क्या फर्क रह जाएगा? सोशल मीडिया की खबरें बहुत जल्दी आ जाति है!

लेकिन लोग फिर भी उसी खबर को कल के अखबारों और पत्र -पत्रिकाओं में पढ़ना पसंद करते है, जानते है क्यों ? क्योंकि प्रिंट मीडिया के पास खबरों का तोड़ होता है!

थोड़ी देर से ही सही लेकिन आपकी खबरों का दुरुस्त खबर बनके प्रकाशित होना अपने आप में एक उपलब्धि हैl इसलिए प्रिंट मीडिया पर लोगों का भरोसा आज भी बरकरार है l

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