बिहार। राजनगर की लाइब्रेरी अब ज्ञान का मंदिर नहीं रही
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
मधुबनी जिले की राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी कभी इस इलाके की शान हुआ करती थी। दूर-दूर से छात्र यहां पढ़ने आते थे। बुजुर्ग अखबार और पत्रिकाओं के साथ बैठकर देश-दुनिया की चर्चा करते थे। लेकिन आज उसी लाइब्रेरी की दीवारें चीख-चीख कर अपनी बदहाली की कहानी सुना रही हैं। पिछले ग्यारह साल से इस संस्था में चुनाव नहीं हुए।यदि हुए भी तो सिर्फ खाना पूर्ति के लिए l
एक ही समूह बिना किसी जवाबदेही के यहां काबिज है। संस्था के नियम कहते हैं कि हर तीसरे साल नई कमेटी बनेगी, लेकिन यहां नियमों को ताक पर रख दिया गया है। सदस्यता के नाम पर हर साल हजारों रुपये वसूले जाते हैं। दान और सरकारी मदद भी आती है। मगर आय-व्यय का कोई हिसाब किसी को नहीं दिखाया जाता। जब कोई सवाल करता है तो उसे धमका दिया जाता है। पारदर्शिता शब्द यहां से मानो गायब ही हो गया है।
इससे भी ज्यादा पीड़ा तब होती है जब हम देखते हैं कि ज्ञान के इस मंदिर का इस्तेमाल किस काम के लिए हो रहा है। बिहार में शराबबंदी कानून पूरी सख्ती से लागू है। बाल श्रम पर भी रोक है। फिर भी लाइब्रेरी परिसर को शादियों और पार्टियों के लिए किराए पर दिया जा रहा है। रात होते ही यहां डीजे की आवाज गूंजती है। शराब की बोतलें खुलती हैं और अश्लील नृत्य होता है। जिस जगह बच्चों के हाथों में किताब होनी चाहिए थी, वहां अब गंदे गानों की धुन सुनाई देती है। यह सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी के चरित्र के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है।
इतना सब होने के बाद भी जिला प्रशासन, निबंधन विभाग और शिक्षा विभाग चुप हैं। शिकायतें गईं, अखबारों में खबरें भी छपीं, मगर जमीन पर कुछ नहीं बदला। आखिर क्यों? क्या लाइब्रेरी कमेटी इतनी ताकतवर हो गई है कि कानून भी उसके सामने झुक जाए? या फिर मामला ऊपर तक सेट है? यह सवाल आज हर आम आदमी के मन में है।
जब हमने इस सच्चाई को लिखने की हिम्मत की तो हमें चुप कराने की कोशिश हुई। लेकिन हम चुप नहीं बैठेंगे। क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारा संवैधानिक अधिकार है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना अपराध नहीं है। अगर आज हम डर गए तो कल कोई भी सार्वजनिक संपत्ति को अपनी निजी जागीर बना लेगा।
राजनगर की लाइब्रेरी सिर्फ ईंट और सीमेंट की इमारत नहीं है। यह सौ साल पुरानी विरासत है। यह हमारे बच्चों का भविष्य है। इसलिए अब और देर नहीं की जा सकती। सरकार को चाहिए कि वह तुरंत हस्तक्षेप करे। किसी स्वतंत्र एजेंसी से पूरे मामले की जांच कराई जाए। शराबबंदी, अश्लील डांस और बाल श्रम कानून तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। और सबसे जरूरी, जल्द से जल्द निष्पक्ष चुनाव कराकर इस संस्था को आम जनता को सौंपा जाए।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो जनता को सड़क पर उतरना पड़ेगा। क्योंकि सवाल सिर्फ एक लाइब्रेरी का नहीं है। सवाल इस बात का है कि बिहार में कानून का राज चलेगा या भ्रष्टाचार का। सवाल इस बात का है कि हम अपने बच्चों को कैसा समाज देकर जाएंगे l