जब शिक्षा सड़क पर हो और सत्ता खामोश
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
दिल्ली से मधुबनी तक धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ छात्रों का आंदोलन उग्र रूप ले चुका हैं l क्लास रूम सूने हैं और सड़कें भरी हैं। हाथ में किताब की जगह बैनर है और जुबान पर सवाल। अभी देश की राजधानी दिल्ली से लेकर बिहार के मधुबनी जिले तक यही नजारा है। छात्रों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और तमाम जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले कई दिनों से भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही। विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और कॉलेजों से आए छात्र एक ही मांग कर रहे हैं। पेपर लीक पर रोक लगे। NEET और JEE जैसी परीक्षाओं में पारदर्शिता आए। छात्रवृत्ति का पैसा समय पर मिले और शिक्षा का बजट बढ़े।
आंदोलन का सबसे बड़ा निशाना शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं। छात्रों का कहना है कि जब पेपर लीक होता है तो मंत्री बयान देकर चले जाते हैं।
जब रिजल्ट लेट होता है तो जांच कमेटी बना दी जाती है। पर जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। इसी गुस्से में जंतर-मंतर की दीवारों पर पोस्टर लगे हैं जिन पर लिखा है हमारा भविष्य दांव पर है और आप खामोश हैं। पुलिस ने बैरिकेड लगाए, हिरासत में भी लिया, पर छात्र डटे हैं। उनका कहना है जब तक बात नहीं होगी तब तक आंदोलन वापस नहीं होगा।
दिल्ली की ये आग मधुबनी तक पहुंची है। मधुबनी जिले में भी छात्र सड़क पर उतर आए हैं। यहां राष्ट्रीय मुद्दों के साथ स्थानीय समस्याएं भी जुड़ गई हैं। मधुबनी के कॉलेजों में शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। लैब में उपकरण नहीं हैं। लाइब्रेरी में नई किताबें नहीं आ रही हैं। सबसे ज्यादा परेशानी छात्रवृत्ति को लेकर है।
गरीब घरों के बच्चे महीनों से अपने पैसे का इंतजार कर रहे हैं। ऊपर से हर साल फीस बढ़ती जा रही है। मधुबनी के जिला मुख्यालय पर छात्रों ने प्रदर्शन किया और प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। नारेबाजी के बीच धर्मेंद्र प्रधान का नाम भी गूंजा।
छात्रों का आरोप है कि दिल्ली में नीति बनती है और उसकी मार मधुबनी जैसे जिलों के छात्रों को झेलनी पड़ती है। स्थानीय नेताओं पर भी गुस्सा है। चुनाव के समय शिक्षा और रोजगार के बड़े-बड़े वादे होते हैं। जीतने के बाद नेता मिलते ही नहीं।
छात्रों का दर्द एक जैसा है। वो मेहनत करते हैं, फॉर्म भरते हैं, फीस देते हैं। फिर पेपर लीक हो जाता है। परीक्षा टल जाती है। रिजल्ट अटक जाता है। और जब सवाल पूछो तो जवाब में खामोशी मिलती है। सबसे खतरनाक यही खामोशी है।
दिल्ली में आंदोलन चल रहा है तो मंत्री जी उसे राजनीतिक साजिश बता देते हैं। मधुबनी में छात्र ज्ञापन देते हैं तो कहा जाता है ये मामला केंद्र का है। केंद्र कहता है राज्य देखेगा। इसी बीच छात्र का एक साल बर्बाद हो जाता है।
शिक्षा जब सड़क पर आ जाती है तो इसका मतलब साफ है कि सिस्टम कहीं न कहीं फेल हो गया है। क्लासरूम खाली होंगे तो देश का भविष्य कैसे बनेगा। जो हाथ में कलम होनी चाहिए थी उसमें आज पोस्टर है। जो दिमाग में सवाल होने चाहिए थे उसमें गुस्सा है।
छात्र अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। दिल्ली में अनिश्चितकालीन धरने की बात हो रही है। मधुबनी में भी चरणबद्ध आंदोलन की तैयारी है। उनकी मांग बहुत साफ है। पेपर लीक करने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो। छात्रवृत्ति का पैसा तुरंत खाते में आए। खाली शिक्षक पदों पर बहाली हो। और सबसे जरूरी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान खुद सामने आकर छात्रों से सीधी बात करें।
एक देश तभी आगे बढ़ता है जब उसके युवा पढ़ाई कर रहे हों। जब वही युवा सड़क पर हों तो समझिए कि सरकार को आईना दिखाने की जरूरत है। अभी भी वक्त है। बैरिकेड और लाठी से नहीं, संवाद से समस्या सुलझेगी। वरना इतिहास फिर वही लिखेगा जो हर बार लिखा जाता है। जब शिक्षा सड़क पर थी तब सत्ता खामोश थी।