तीज-त्योहार और संस्कार ही सनातन धर्म की वास्तविक पहचान हैं : श्री गजेन्द्र गोपाल जी शास्त्री

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शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक।

शाहपुरा, 6 अगस्त। माहेश्वरी पंचायत भवन, सदर बाजार, शाहपुरा में आयोजित नौ दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के दौरान पूज्य श्री गजेन्द्र गोपाल जी शास्त्री ने श्रद्धालुओं को सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, तीज-त्योहारों और पारिवारिक संस्कारों का महत्व समझाया।

उन्होंने कहा कि केवल जन्म से हिंदू होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने जीवन में सनातन धर्म के संस्कार, आचरण और परंपराओं को अपनाना ही उसकी वास्तविक पहचान है।

यदि हमारी नई पीढ़ी अपने तीज-त्योहार, संस्कार और धार्मिक परंपराओं से दूर हो जाएगी, तो हमारी सांस्कृतिक विरासत भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगी।कथा व्यास ने कहा कि दीपावली, होली, गणगौर, जन्मोत्सव, व्रत एवं पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और पारिवारिक एकता के प्रतीक हैं। पहले समाज इन पर्वों को सामूहिक रूप से उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाता था, जिससे सामाजिक समरसता और पारिवारिक संबंध मजबूत होते थे।

उन्होंने श्रद्धालुओं से इन परंपराओं को पुनः जीवंत बनाने का आह्वान किया।उन्होंने विशेष रूप से गणगौर, होली तथा अन्य सनातन पर्वों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक पर्व के पीछे आध्यात्मिक संदेश और जीवनोपयोगी शिक्षा छिपी हुई है। भारतीय परंपरा में जन्मोत्सव, संस्कार और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है, जिन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है।

कथा के दौरान गजेन्द्र गोपाल शास्त्री ने भगवान के विभिन्न अवतारों और उनसे जुड़े व्रतों की महत्ता बताते हुए कहा कि परशुराम जयंती, वामन जयंती, नरसिंह जयंती सहित सनातन धर्म के प्रत्येक पर्व और व्रत के पीछे गहरा आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक आधार है। हमारे ऋषि-मुनियों ने तिथि, वार, नक्षत्र और ऋतु के अनुरूप व्रत एवं पर्वों की परंपरा स्थापित की, जिससे मनुष्य के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, अनुशासन और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

उन्होंने कहा कि भगवान के अवतार केवल धार्मिक कथाएँ नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन के आदर्श हैं, जो धर्म, कर्तव्य, मर्यादा, साहस और सेवा का संदेश देते हैं। सनातन धर्म का प्रत्येक पर्व और व्रत मनुष्य को प्रकृति, संस्कृति और ईश्वर से जोड़ने का माध्यम है।कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर शिव महापुराण का श्रवण किया तथा धर्म, संस्कृति और संस्कारों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

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