राजनगर की पब्लिक लाइब्रेरी और पत्रकार “जब एक कलम ने तिजोरी पर सवाल उठा दिया
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं समय था जब “राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी ” मधुबनी जिले की पहचान थी। गांव-देहात से आए लड़के यहां खपडे के कमरे पर बैठकर BPSC, UPSC की किताबें घोंटते थे। लड़कियां कोने में बैठकर मैगजीन और अखबार पढ़ती थीं। लाइब्रेरियन सबका नाम जानते थे और किताबें खुद निकालकर देते थे। लोग कहते थे कि राजनगर में अगर कोई असली मंदिर है तो वो ये लाइब्रेरी ही है।
पर आज उसी मंदिर की दीवारें सवाल पूछ रही हैं। अंदर विवाह में आए वाराती हैं, मेजों पर धूल जमी है और बाहर की चर्चाएं शर्म से सिर झुका देती हैं। कहा जाता है कि सालों से ऑडिट नहीं हुआ। चंदे और सरकारी अनुदान का हिसाब किसी को नहीं पता। सदस्यता के नाम पर कागजों पर ऐसे-ऐसे नाम हैं जो कभी लाइब्रेरी की सीढ़ी भी नहीं चढ़े। चुनाव की बात करो तो जवाब मिलता है कि “वही लोग ग्यारह साल से अधिक कमेटी चला रहे हैं”। और सबसे शर्मनाक बात तब हुई जब इसी लाइब्रेरी परिसर का एक अश्लील डांस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। साथ ही कई रजिस्ट्रेशन प्राप्त अखबार में प्रकाशित भी हुई l
जब सबने आंखें बंद कर लीं, तब राजनगर के ही एक पत्रकार ने आंखें खोलीं। उनका नाम है प्रदीप कुमार नायक । कोई पद नहीं, कोई कुर्सी नहीं। बस एक आम नागरिक जो चाहता था कि उसकी मिट्टी की लाइब्रेरी बदनाम न हो।
प्रदीप जी ने कलम उठाई। एक के बाद एक 15 लेख लिखे। हर लेख में सवाल था, हर लेख में दर्द था। उन्होंने सबूत जुटाए और एक वीडियो “सिटीजन आवाज़” चैनल तक पहुंचाया। इसके बाद कई अखबार में खबर भी छपी l “राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी: सवालों के घेरे में सार्वजनिक संस्था” तथा कई शीर्षक देकर खबर भी छपी l
सच बोलने तथा लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। धमकी मिली, ताने मिले, कहा गया कि “तुम्हें क्या लेना-देना”। पर राजनगर का पत्रकार टूटा नहीं। क्योंकि वो जानता था कि ये लड़ाई ईंट-पत्थर की नहीं है। ये लड़ाई उस गरीब के बेटे के सपने की है जिसके पास कोचिंग के पैसे नहीं हैं। ये लड़ाई उन बेटियों की सुरक्षा की है जो कभी यहां पढ़ने आती थीं। ये लड़ाई जनता के उस पैसे की है जो टैक्स से आता है और स्वार्थियों की जेब में चला जाता है।
खबर छप गई, वीडियो सबने देख लिया, फिर भी जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की तरफ से कोई जांच नहीं, कोई जवाब नहीं, कोई ऑडिट नहीं। RTI लगाओ तो जवाब नहीं आता। सदस्यता सूची मांगो तो फाइल गायब हो जाती है। सवाल सीधा है कि क्या अखबार में नाम आ जाना ही सजा है? क्या
सार्वजनिक संस्था में पारदर्शिता मांगना गुनाह है? अगर आने वाले दिनों में निष्पक्ष जांच नहीं हुई और हिसाब सार्वजनिक नहीं हुआ, तो अगला दरवाजा माननीय उच्च न्यायालय और सूचना आयोग का होगा।
इतिहास गवाह है कि बदलाव हमेशा एक आदमी से शुरू होता है। गांधी अकेले थे, जयप्रकाश अकेले थे। आज राजनगर में वो अकेला नाम पत्रकार प्रदीप कुमार नायक का है। उन्होंने साबित कर दिया कि एक कलम, एक कैमरा और एक जिद मिल जाए तो सिस्टम को भी जवाब देना पड़ता है।
राजनगर की लाइब्रेरी बचेगी। क्योंकि राजनगर का पत्रकार झुका नहीं,और क्योंकि अब राजनगर की जनता जाग गई है।”ज्ञान के मंदिर में अब अश्लीलता नहीं चलेगी। किताबों की जगह भ्रष्टाचार नहीं चलेगा।”