नैतिक शिक्षा से बच्चों के चरित्र का निर्माण होगा : भगवान भाई

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पचोर, 20 अगस्त। शिक्षा का मूल उद्देश्य चरित्र का निर्माण करना, असत्य से सत्य की ओर ले जाना तथा बंधनों से मुक्ति की ओर अग्रसर करना है। भौतिक शिक्षा से जहां भौतिक ज्ञान और सुविधाओं का विकास होता है, वहीं नैतिक शिक्षा से व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है। वर्तमान समय में भौतिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को नैतिक शिक्षा की भी आवश्यकता है।

यह बात माउंट आबू राजस्थान से आए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने शासकीय गांधी बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को संबोधित करते हुए कही।उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को मूल्यांकन, आचरण, अनुकरण, लेखन और व्यवहारिक ज्ञान जैसे विषयों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वर्तमान समाज में मूल्यों की कमी ही अनेक समस्याओं का मूल कारण है।

जब तक हमारे व्यवहारिक जीवन में परोपकार, सेवाभाव, त्याग, उदारता, पवित्रता, सहनशीलता, नम्रता, धैर्य, सत्यता और ईमानदारी जैसे सद्गुण नहीं आते, तब तक हमारी शिक्षा अधूरी है।भगवान भाई ने शिक्षा और जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि “शिक्षा एक बीज है और जीवन एक वृक्ष है।

जब तक हमारे जीवन रूपी वृक्ष में गुण रूपी फल नहीं आते, तब तक हमारी शिक्षा अधूरी है।” उन्होंने कहा कि समाज प्रेम, सद्भावना, भ्रातृत्व, नैतिकता और मानवीय सद्गुणों से संचालित होता है।उन्होंने कहा कि भौतिक शिक्षा से भौतिकता का विकास होता है, जबकि नैतिक शिक्षा से व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है।

नैतिक शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है, जो आगे चलकर कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए आत्मविवेक और आत्मबल प्रदान करता है। सच बोलना, चोरी न करना, अहिंसा, दूसरों के प्रति उदारता, शिष्टता, विनम्रता और स

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