अंधेर नगरी / प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार !
भारत के सबसे करीबी मित्र देश नेपाल ने एक बार फिर भारत को परेशान करने वाली हरकत की हैं l उसने नेपाल राष्ट्र बैंक की ओर से जारी अपने एक सौ रूपये के नए नोट पर भारतीय क्षेत्र कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपना इलाका बताया हैं l जिस तरह नेपाल अपनी भूमि को किसी भी देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करने देने के बारें में स्पष्ट हैं l उसी तरह उसकी भूमिका पर अन्य देशों के समझौते से भी असहमत हैं l नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग के साथ स्पष्ट बयान दिया l जिसमें सार्वभौम देश का मजबूत रुख होता हैं l तथ्य, प्रमाण हर कोई हाल ही में लिपुलेख को एक व्यापार ब्लॉक बनाने के लिए सहमत हुआ हैं l भारत सरकार से नेपाल के रिश्ते दिन प्रतिदिन ख़राब होती जा रही हैं l
दूसरी ओर हमारा मजबूत प्रतिद्वंदी चीन इसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश में लग गया हैं l नेपाल का जन मानस खासकर पहाड़ी समुदाय तो भारत विरोध का दम्भ भर रहा हैं हैं l वहां का राजनैतिक नेतृत्व भारत के खिलाफ कड़ी बयानवाजी से जरा भी परहेज नहीं कर रहा हैं l भारत से सदियों पुराना सम्बन्ध रखने वाले नेपाल के लोग हमारे यहाँ नौकरी – चाकरी के अलावे गोरखा फ़ौज तक में शामिल होते रहे हैं l उनको भारत से इतना नफरत कैसे हो गया ? परिणाम साबित करता हैं कि कहीं न कहीं कम्युनिकेशन गैप हुई हैं l कहीं न कहीं भारत ने अपने सबसे करीबी पडोसी को बदलते नजरिए को समझने में भारी भूल की हैं l भारत और नेपाल दोनों कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपना अभिन्न अंग कहते हैं l विगत वर्ष नेपाल के मंत्री परिषद की बैठक ने नेपाल का नया नक्शा पास किया था, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा शामिल हैं l
कैबिनेट की बैठक को सार्वजनिक करने के लिए एक संवाददाता सम्मेलन में नेपाल सरकार के प्रवक्ता डॉ. युवराज ख़तिवाड़ा ने कहाँ था कि भूमि प्रबंधन सहकारिता और गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित नेपाल के अधतन नक़्शे को मंजूरी दे दी गई थी l उन्होंने कहाँ था कि नेपाली भूमि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नए नक़्शे में शामिल किया गया हैं, और अन्य अंतराष्ट्रीय सीमाएं समान हैं l अपडेट किए गए नक़्शे का उपयोग मार्क प्रिंटिंग, सरकारी काम और स्कूलों सहित सभी क्षेत्रों में किया जायेगा l नेपाल का कहना हैं कि 04 मार्च 1816 में नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच सुगौली संधि हुआ था l इसमें कालापानी इलाके होकर बहने वाली महाकाली नदी भारत और नेपाल की सीमा मानी गई हैं l हालांकि सर्वे करने वाली ब्रिटिश ऑफिसर ने बाद में नदी का उदगम स्थल भी चिन्हित कर दिया था l जिसमें कई सहायक नदियां भी मिलती हैं l वहीं नेपाल का दावा हैं कि विवादित क्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र से गुजरने वाली जलधारा ही वास्तविकता क्षेत्र हैं l इसलिए कालापानी नेपाल के क्षेत्र में आता हैं l
वहीं भारत नदी का उदगम स्थल अपने तरफ बताते हुए इसे अपने हिस्से का भाग बताता हैं l सन. 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ कालापानी विवाद पर चर्चा हुई थी l 1815 में जब ब्रिटिश सेनाओं के साथ गोरखाओ का युद्ध हुआ था तो यह हिस्सा उन्होंने जीत लिया था l उस समय नेपाल सरकार के साथ सुगौली नामक संधि हुई थी l जिसमें नेपाल के महाराजा ने यह हिस्सा ब्रिटिश को सौप दिया था l मगर नेपाल का दावा हैं कि कालापानी और लिपुलेख को उसने ईस्ट इंडिया कम्पनी से हासिल किया था l जहाँ उन्होंने 1961 में जनगणना भी करा चुका हैं l तब भारत ने कोई आपत्ति नहीं की थी l नेपाल का यह भी कहना हैं कि 1857 में इंडिया ने खूद नक्शा बनाकर दिया था l जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल के नक़्शे में दर्शाया गया हैं l एक नवम्बर 1860 में बांके,वर्दिया, कैलाली और कंचनपुर का समझौता हुआ था l उसके बाद उसे वापस करने पर विचार हुआ था l 07 जनवरी 1875 में दांग, टूदुआ क्षेत्र का भारतीय सर्वे का पेपर नेपाल के पास हैं l जिसमें भारत सरकार का हस्ताक्षर हैं l 1915 में जो वोटर आई डी कार्ड थी,वह नेपाल के पास हैं l 2018 में जो नेपाल की जनगणना हुई थी,वह भी नेपाल के पास हैं l नेपाल का जमीन पहले एक लाख 47 हजार 557 वर्ग किलो मीटर थी जो अब एक लाख 41 हजार 181 वर्ग किलोमीटर हैं l बाकी के 06 हजार 373वर्ग किलोमीटर अतिक्रमण किया गया l नेपाल के 45 जिलों में भारत का बॉर्डर हैं l
नया राजनीतिक नक्शा सामने आने के बाद से ही नेपाल की मीडिया में अधिकांश बड़ी सुर्खियां इस मुद्दे के आसपास बन रही हैं l सभी अखबारों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से प्रकाशित किया l नेपाल सरकार के स्वामित्व वाले गोरखा पत्र दैनिक अखबार ने पहले पन्ने पर नया नक्शा प्रकाशित किया और नेपाल का नया नक्शा सार्वजनिक शीर्षक लिखा था l सरकार के स्वामित्व वाले द राइजिंग नेपाल ने भी लिखा था कि सरकार ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को शामिल कर नया मानचित्र जारी किया था l निजी स्वामित्व वाले नामी दैनिक अखबार कांतिपुर, द काठमांडू पोस्ट, अन्नपूर्णा पोस्ट, नागरिक और नया पत्रिका ने भी इस मुद्दे पर सभी अपडेट और विश्लेषण के साथ नए नक़्शे को प्रकाशित किया था l साथ ही इन अखबारों ने भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए वयान को भी प्रकाशित किया था l इन अखबारों ने नेपाल के लोगों को यह समझाने का प्रयास किया था कि इस मुद्दे पर भारत की चिंतायें क्या हैं? दैनिक अखबार कांतिपुर ने सारी सूचनाओं के साथ एक लेख प्रकाशित किया था,जिसे अखबार ने स्पष्ट प्रमाण बताया था कि आखिर क्यों नेपाल का अपने नक़्शे को लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख तक फैला लेना जायज हैं l
अखबार ने 1816 सुगौली संधि, भारत के द्वारा जारी किए गए मानचित्र, 1860 की संधि, 1875 के मानचित्र, स्थानीय लोगों की भूमि, राजस्व की रसीदो, 1958 के चुनाव में मतदाता सूची और 1961 की राष्ट्रीय जनगणना का हवाला देते हुए नेपाल सरकार के कदम को सही ठहराया था l नेपाल के लगभग सभी निजी क्षेत्र के मीडिया संस्थानों ने भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान को यह कहते हुए स्थान दिया था कि नेपाल का ये कदम भारत के लिए अस्वीकार्य हैं l 1929 में भारत और नेपाल सीमा पर कर्नल जैक्सन ब्रिटिश भारत की ओर से तथा नेपाल की ओर से राणा जंग बहादुर ने एक समझौता द्वारा दोनों देशों का सीमांकन किया था l
लेकिन नेपाली मीडिया ने 1816 में हुई सुगौली संधि को आधार मानते हुए ही भारत के लम्बे भू – भाग पर दावा ठोकता हैं l वे 02 दिसंबर 1816 के ब्रिटिश भारत और नेपाल के तत्कालीन राजा राजेंद्र वीर विक्रम साह तथा प्रधानमंत्री भीमसेन थापा के बीच हुए सुगौली संधि को नेपाल के साथ विश्वास घात बता रहें हैं l नेपाल सरकार वर्तमान में सिर्फ अपनी असक्षमता छिपाने के लिए राष्ट्रीयता की बात उठा रही हैं l इसी बात से ध्यान हटाने के लिए बीच -बीच में सरकार यह गेम खेल रहीं हैं l कालापानी का विषय भी ऐसा ही हैं l नेपाल में गणतंत्र की स्थापना, माओवादियों के नेतृत्व में नई सरकार फिर कम्युनिष्ट सरकार के गठन के बाद वहां भारत विरोधी मुहिम तेजी से आई l दूसरी ओर नेपाल में भारत के रिश्तों को बिगाड़ने के लिए कुछ ताकतें सक्रिय हैं l यह एक खुली पर गोप्य सत्य हैं, तो उन सक्रिय ताकतों का सफाया करने की जिम्मेदारी भी सरकार को ही हैं l आनन -फानन में कुछ भी फैसला करके खूद को बचाने की सरकारी कोशिश सकारात्मक परिणाम नहीं देगा l खैर जो भी हो इतना तो विश्व समुदाय को यह स्पष्ट देने के लिए काफ़ी हैं कि कभी चीन, कभी पाकिस्तान, कभी बांग्लादेश तो कभी नेपाल द्वारा हमारी अस्मिता पर प्रहार होता रहा हैं,और हमारी प्रशासनिक विफलता पर अट्टiहास लगाया जाता रहा l फिर भी हम मुक दर्शक बनकर इसे देखते रहते हैं l
शांति अच्छी बात हैं, परन्तु युद्ध के प्रति निष्क्रियता सभ्यता विनाश के ताबूत पर अंतिम कील जड़ देने में अपनी निर्णायक भूमिका निभाती हैं l अगर समय रहते भारत ने ऐसी घृष्टता को उसका मुहतोड़ जवाब नहीं दिया तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपनी भूमि पर ही अपने प्रियजनों का रक्त मिश्रित ताबूत उठाने को बाध्य होंगे l अब सरकार आम जनता के मन में व्याप्त भय को किस तरह दूर कर पाता हैं l यह तो वक़्त ही बताएगा l पर इतना तो निश्चित हैं कि ऐसी घटनाओं पर काबू नहीं पाया गया तो सीमा क्षेत्र में माहौल बहुत जल्द बेकाबू हो सकता हैं l अब सवाल ये भी उठ रहें हैं, कि क्या चीन ने नेपाल को उकसाकार ऐसा कदम उठाया हैं l दरअसल, 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के जवानों में टकराव हुआ था l उस समय दोनों देशों के रिश्ते काफ़ी बिगड़ गए थे l ऐसी चर्चा हैं कि उस समय चीन ने नेपाल की तात्कालिन सरकार से करीबी बढ़ाई l
इसी बीच नेपाल का अपडेट राजनीतिक नक्शा सुर्खियों में आया, और विवाद बढ़ा l नेपाल सरकार ने नोट छपवाने के लिए चीन का साथ दिया l मई 2020 में जब के पी शर्मा ओली प्रधानमंत्री थे तब नेपाल की संसद ने कालापानी लिपुलेख और लिम्पियाधुरा इलाके को शामिल करते हुए नक़्शे को अपडेट किया था l इस तरह की परेशान करने वाली घटना को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने की उम्मीद हैं, उसे लेकर सवाल उठ रहें हैं कि कहीं ये चीन की साजिश तो नहीं हैं l
























