प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
वैश्य समाज मधुबनी में इतने लम्बे अंतराल के बाद आयोजित वैश्य समाज चिंतन तथा नई संगठन का चुनाव शिविर ने कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को जन्म दिया l यह आयोजन जहाँ एक ओर नई संगठन को गठन का अवसर बना, वहीं दूसरी ओर संगठन की कार्य प्रणाली, पारदर्शिता और उद्देश्यों को लेकर गंभीर चिंताएं भी सामने लाई l
लोकतान्त्रिक संस्थाओं की आत्मा नियमित और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया में निहित होती हैं l लेकिन जब किसी संगठन का कार्यकाल निर्धारित अवधि से कहीं अधिक लम्बा खींच जाए, तो स्वाभाविक रूप से उस पर सवाल उठते हैं l यहाँ भी यहीं स्थिति देखने को मिली l
निर्जीव संगठन को जीवित का अर्थ किसी निष्प्राण या मृत प्राय संस्था तथा व्यवस्था को नई ऊर्जा देकर क्रियाशील बनाना हो सकता हैं l मधुबनी जिला वैश्य समाज संगठन में दूरदर्शी नेतृत्व और प्रेरणादायक संचार का समावेश कर आधुनिक दौर की आवश्यकताओं के अनुसार कार्यप्रणाली, लक्ष्यों और नीतियों को अपडेट करके वैश्य समाज संगठन को आगे बढ़ाया जा सकता हैं l दूसरी ओर वित्तीय स्थिति को सुधारकर लोगों का कौशल बढाकर ग्रामीण से शहर स्तर तक टीम वर्क करने वाले को प्रोत्साहित कर इसे आगे बढ़ाया जा सकता हैं l
जब वैश्य संगठन निर्जीव हो चुकी हैं तो उसे जिन्दा रखने का कोई औचित्य नहीं हैं l इसे पुन: जीवित न रखते हुए इसका नामाकरण बदल देना चाहिए l मधुबनी शहर के एक होटल के सभागार में वैश्य समाज मधुबनी जिला द्वारा एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य मधुबनी वैश्य समाज का पूर्णगठन और चिंतन शिविर था l सभा को सम्बोधित करते हुए कई वक्ताओं ने कहाँ की वैश्यों की आबादी 25 प्रतिशत से अधिक हैं, लेकिन राजनीतिक भागीदारी नगन्य हैं l हम अनेक उप जातियों में बटें हुए हैं और एक दूसरे को अपने से नीचे दिखाने का काम करते हैं लिए
वैश्य समाज 56 उपजातियों में बटें हुए हैं l वैश्य लोग ही अपने उपजातियों पर जातिगत कटाक्ष करते हैं l
कार्यक्रम के आयोजक और मंच संचालक कर्ता शिक्षक एवं समाज सेवी नवीन ठाकुर ने कहाँ कि हम इस वैश्य समाज संगठन से संतुष्ट नहीं हैं l इस संगठन का पूर्णगठन होना चाहिए l
वैश्य समाज के संगठन के गठन का मुख्य उद्देश्य समाज को राजनीतिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना हैं l वैश्य समाज कई उप जातियों में बटा हुआ हैं, जिससे इनकी संगठित ताकत कमजोर हो रहीं हैं l इस संगठन में मुख्य द्वारिक पूर्व, फागुलाल साह, लाल बाबू साह समेत दो – चार लोग हैं, जो इसे हर हमेशा अपनी पॉकेट की संस्था समझा लिए
इसलिए इस वैश्य समाज संगठन की यह दुर्दशा हुई l इन लोगों पर वैश्य समाज तथा संगठन के प्रति ख़राब प्रदर्शन, अनुशासन हीनता, नीतियों का उल्लंघन करने का भी आरोप लगा हैं l इन लोगों को उसकी भूमिका, अधिकारों और सेवाओं से स्थायी या अस्थायी रूप से मुक्त कर देना चाहिए l यह नियमों का उल्लंघन, ख़राब प्रदर्शन या पूर्णगठन से ही संभव हो सकता हैं l
पूरानी कमेटी को भंग कर उसे उसी दिन सेवा से मुक्त कर नए संगठन का नामाकरण कर विस्तार कर देना चाहिए l इस वैश्य संगठन के चिंतन शिविर में जिले के कई वैश्य संगठन से जुड़े सामाजिक लोगों को न बुलाना तथा अनदेखा कर देना भी एक सवालियां निशान खड़ा करता हैं? बिना रजिस्ट्रेशन के नियम – कानून और वॉयलॉज को ताक पर रखकर इतने वर्षों तक ये लोग कैसे वैश्य समाज संगठन के नाम पर कार्यरत तथा पद पर बने रहें, यह आश्चर्य जनक सवाल हैं?
पुनर्गठन का मतलब सिर्फ चेहरे बदलना नहीं सोच बदलना होता हैं l ज्यादातर संगठनों का संविधान कहता हैं कि तीन साल पर चुनाव हो जाना चाहिए, लेकिन ये लोग – 25 वर्षों से अधिक समय से पद पर काबिज रहें, आखिर कैसे और क्यों ?















