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दतिया। शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय दतिया में लोकायुक्त जांच के बावजूद आरोपी चिकित्सक को अस्पताल अधीक्षक पद पर बनाए रखने को लेकर उठे गंभीर सवाल ?

आखिर क्यों है भ्रष्ट अधिकारीयों से प्रेम डीन दीपक सिंह मरावी को ? लोकायुक्त से सजा प्राप्त, मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक डॉ अर्जुन सिंह पर मेहरबान डीन दीपक सिंह मरावी ना जांच के दौरान और ना ही जांच के बाद मिली सजा के बाद हटाया पद से दतिया। शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय दतिया में लोकायुक्त जांच…

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आखिर क्यों है भ्रष्ट अधिकारीयों से प्रेम डीन दीपक सिंह मरावी को ?

लोकायुक्त से सजा प्राप्त, मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक डॉ अर्जुन सिंह पर मेहरबान डीन दीपक सिंह मरावी ना जांच के दौरान और ना ही जांच के बाद मिली सजा के बाद हटाया पद से

दतिया। शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय दतिया में लोकायुक्त जांच के बावजूद आरोपी चिकित्सक को अस्पताल अधीक्षक पद पर बनाए रखने को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे है। दस्तावेज़ों से साफ है कि भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायत में दोषी पाए जाने के बाद भी प्रशासनिक प्रमुखों ने डॉ अर्जुन सिंह को न तो पद से हटाने की पहल की और न ही जनहित की संवेदनशीलता का ध्यान रखा।

लोकायुक्त प्रकरण और आरोपों का सार नोटशीट व कार्यालय आदेश के अनुसार प्रकरण लोकायुक्त शिकायत क्रमांक 0344/ई/2021-22 से जुड़ा है, जिसमें डॉ. अर्जुन सिंह, प्राचार्य एवं विभागाध्यक्ष (पैथोलॉजी), दतिया मेडिकल कॉलेज पर आर्थिक अनियमितताओं व भ्रष्टाचार के आरोप लगे।

जांच में अस्पताल से जुड़ी वित्तीय प्रक्रियाओं में चार में से दो आरोप सिद्ध माने गए, जिसके आधार पर दो वेतन-वृद्धियाँ असंचयी रूप से रोकने का दंड प्रस्तावित/स्वीकृत किया गया।

पद पर बने रहने पर उठते सवाल दस्तावेज़ों से स्पष्ट है कि शिकायत लंबित रहने के दौरान भी तथा दंड आदेश दिनांक 27.08.2024 के बाद भी डॉ. अर्जुन सिंह को अस्पताल अधीक्षक जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर बनाए रखा गया।

जनप्रतिनिधियों व कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि जब किसी अधिकारी पर आर्थिक भ्रष्टाचार की जांच चल रही हो, तब उसी को अस्पताल के समस्त वित्तीय व प्रशासनिक अधिकार सौंपना पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है और इससे लोकायुक्त जांच निष्पक्ष रूप से प्रभावित हो सकती है।


जांच पर संभावित प्रभाव
अस्पताल अधीक्षक पद पर रहते हुए संबंधित अधिकारी के पास फाइलों, रिकॉर्ड, वित्तीय अनुमोदन और अधीनस्थ कर्मियों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण होता है; ऐसे में साक्ष्यों से छेड़छाड़, गवाहों पर दबाव और नियम विरुद्ध आदेशों के माध्यम से जांच की दिशा मोड़ने की आशंका बनी रहती है।

सामान्य प्रशासनिक परंपरा यह रही है कि लोकायुक्त या विभागीय जांच के दौरान अधिकारी को संवेदनशील पद से हटाकर अन्यत्र समायोजित किया जाए, ताकि न तो सरकारी अभिलेखों के साथ खिलवाड़ हो और न ही जांच एजेंसियों पर किसी प्रकार का दबाव बने।


अधिष्ठाता की भूमिका पर प्रश्न
जनसामान्य में यह धारणा बन रही है कि महाविद्यालय के अधिष्ठाता एवं प्रशासनिक शीर्ष स्तर ने न केवल समय रहते डॉ. अर्जुन सिंह को पद से नहीं हटाया, बल्कि दंडादेश के बाद भी उन्हें उसी पद पर बने रहने दिया, जो भ्रष्टाचार के प्रति नरमी और तंत्र की मिलीभगत का संकेत देता है।

नागरिक संगठनों का कहना है कि यदि शीर्ष अधिकारी स्वयं सख्त रुख न अपनाएँ तो लोकायुक्त जैसी संस्थाओं की कार्रवाई भी महज़ कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है, इसलिए अधिष्ठाता व संबंधित उच्चाधिकारियों से पारदर्शी स्पष्टीकरण तथा आरोपों की स्वतंत्र उच्चस्तरीय समीक्षा की मांग उठ रही है|

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