सेवा के नाम पर सौदा

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प्रदीप कुमार नायक _स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

सोशल मीडिया पर अमोल कुमार राय उर्फ अमोल क्रान्ति का एक वाक्य आग की तरह फैल रहा है। उन्होंने लिखा – “ये सेवा समाज नाट्य मंच नहीं था। ये राजनीति और पैसा का मंच था। जब डोनेशन देने वाले को ही मंच पर सम्मान मिले तो चंदा बंद होना चाहिए।”

अमोल ने नकाब उतार दिया। राजनीतिक फायदा, डोनेशन की कमाई, प्रचार का ढोंग और आखिर में जनता का शोषण। मतलब साफ है – जनता से पैसा लो, उसी जनता को भूल जाओ। और अंत में चेतावनी – “सेवा सेवा के लिए हो, स्वार्थ और दिखावे के लिए नहीं। जागो समाज, पहचानो सच!” आज हर गली में एक “सेवा समाज नाट्य मंच” उग आया है। बैनर आसमान छूते हैं, माला-फूल का ढेर, मंच पर कुर्ता-टोपी और कुर्सी पर बैठी ताली बजाती भीड़। ऊपर से देखो तो समाजसेवा। अंदर झांको तो नाटक कम, दलाली ज्यादा। “सेवा” शब्द का इस्तेमाल अब “सत्ता चमकाने” के लिए होता है। चुनाव आते ही नेता पहुंचते हैं, फोटो खिंचती है, चंदे का लिफाफा सरकता है और अगले दिन अखबार में खबर छपती है। सेवा मर जाती है, चेहरा जिंदा हो जाता है। डोनेशन के नाम पर जो हाथ आगे बढ़ते हैं वो हिसाब नहीं मांगते। मंच पर सम्मान उसी का होता है जिसकी जेब सबसे भारी होती है। और जिसके नाम पर ये पूरा तमाशा होता है, वो गरीब आखिरी बेंच पर बैठा सिर्फ तालियां पीटता रह जाता है।

कैमरा, मीडिया, भाषण – “हम समाज के लिए जीते-मरते हैं”। मंच खत्म, लोग गायब। सेवा के नाम पर वसूली, प्रचार के नाम पर नौटंकी और समाज के नाम पर सिर्फ स्वार्थ।

सबसे बड़ा धोखा ये है कि अब जनता को भी इसकी लत लग गई है। लोग कह देते हैं “कुछ तो हो रहा है”। इसी “कुछ” के चक्कर में हम “सही” पूछना भूल गए हैं।

सेवा त्याग मांगती है, तमाशा नहीं। सेवा देना सिखाती है, लेना नहीं। जिस दिन सेवा में स्वार्थ घुसा, उस दिन सेवा नहीं रही। वो सौदा बन गई। और सौदा हमेशा महंगा पड़ता है – आपके टैक्स का पैसा, आपके भरोसे की लाश और आपके बच्चों का भविष्य। अब सवाल पूछना बंद नहीं होगा। चंदा किसकी जेब से आया, कितना आया, कहां गया। मंच पर बैठा शख्स समाजसेवक है या नेता का दलाल। भाषण के बाद जमीन पर एक ईंट भी लगी या नहीं।

याद रखिए – मंच जनता का है। किसी नेता की जागीर नहीं। किसी पैसावाले का प्रचार बोर्ड नहीं। सच्ची सेवा बिना कैमरे के होती है, बिना ताली के होती है, बिना स्वार्थ के होती है। बाकी सब 20 मिनट का नाटक है। नाटक से पेट नहीं भरता।

फैसला आपको करना है। नाटक चाहिए या नतीजा। ताली चाहिए या बदलाव। क्योंकि जब तक ये “सेवा के नाम पर सौदा” चलता रहेगा, तब तक लाइब्रेरी में ताला लटका रहेगा, नाले में गंदगी बहेगी और सड़क पर सिर्फ गड्ढे मिलेंगे।

जागो। पूछो। हिसाब मांगो।मंच आपका है, तो हुकूमत भी आपकी ही होगी।

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