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बिहार। ” हॉल – ए – राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी ” सरकार सोया हैं, प्रशासन मौन और समाज मस्त

प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

पिछले ग्यारह साल से अधिक एक ही ग्रुप के लोग मधुबनी जिले के राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी की संस्था पर अबैध ढंग से विभिन्न पदों पर शोभायमान रहना जो भ्र्ष्टाचार, व्यवस्था, पारदर्शिता और उद्देश्य पर सवाल और विरोधाभासी वयां करती हैं।

सूत्रों के अनुसार लाइब्रेरी के आमसभा के नाम पर खानापूर्ति की गई। समाज को बेवकूफ बनाया गया। जब समाज के अधिकांश लोगों द्वारा समाज सेवी एवं लोकप्रिय व्यक्ति छोटेलाल साह का नाम अध्यक्ष और समाज सेवा में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने वाले मिलनसार व्यक्ति प्रमोद सर्राफ का नाम उपाध्यक्ष पद के लिए लिया गया, उसपर कमेटी के एक पदस्थ व्यक्ति द्वारा यह कहाँ गया कि मैं जिन लोगों का नाम लेता हूँ, वहीं लोग अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव तथा अन्य पदों पर बने रहेंगे वर्ना हम लोग यहाँ से बाहर चले जायेंगे,और हुआ भी वहीं।

यह कहाँ तह उचित था ?

पब्लिक लाइब्रेरी के उल्लेखनीय कतिपय कमियों को उजागर करने वाले, शोषण करने वाले, व्यवस्था, पारदर्शिता और उद्देश्य पर सवाल उठाने वाले आर्टिकल तथा रपटों पर समाज के लोगों द्वारा अनेक प्रतिक्रियाएं मिली हैं। अधिकांश लोगों ने हमारे प्रयास को सराहा हैं। हमने प्रत्येक आर्टिकल तथा समाचार में यथार्थ से जन सामान्य को अवगत कराने के अपने दायित्व का निर्वाहन किया है।

लाइब्रेरी पर हमारा लेख “पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा ग्यारह वर्ष बाद आमसभा, समाजसेवी टॉय – टॉय फिस्स “, “पब्लिक लाइब्रेरी की आमसभा : व्यवस्था, पारदर्शिता और उद्देश्य पर सवाल “, “पब्लिक लाइब्रेरी के विश्वस्सनीयता पर सवाल और आमसभा के आलेख पर हाय तौबा क्यों “?, “पब्लिक लाइब्रेरी की विश्वसनियता पर सवाल और अभिव्यक्ति की आजादी का प्रश्न “, पब्लिक लाइब्रेरी के विश्वसनीयता पर सवाल? और आमसभा के आलेख पर हाय तौबा क्यों “?,” पब्लिक लाइब्रेरी में भ्रष्टाचार पर चुप्पी :सवालों के घेरे में व्यवस्था और समाज, “,”पब्लिक लाइब्रेरी में भ्रष्टाचार और अनियमितता पर शासन – प्रशासन की चुप्पी और समाज “, ” अंधेर नगरी और राज करता राजा “,” जनतंत्र पर सवाल और समाज की जिम्मेदारी “, राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी : ग्यारह साल बेमिसाल या सत्ता का खेल?”, मामला पब्लिक लाइब्रेरी का अंधेर नगरी, अंधेर राजा, टेकेसेर भाजी, टकेसेर खाजा, मामला पब्लिक लाइब्रेरी का : जवाबदेही, पारदर्शिता और सामाजिक जागरूकता की जरुरत में हमने यथार्थ से जन सामान्य को अवगत कराने के अपने दायित्व को निर्वाहन किया हैं।

निजी लाभ के लिए लाइब्रेरी जैसे सार्वजनिक संस्था तथा शक्ति या पद का दुरूपयोग हैं। जो स्थानीय विकास, न्याय और लोकतंत्र को कमजोर करने वाली एक गंभीर सामाजिक – आर्थिक बीमारी हैं। संविधान में कहीं नहीं लिखा हैं कि सार्वजनिक संस्था की बातों का गोपनीयता का अधिकार हैं। लेकिन भारत के संविधान में आर्टिकल 21 में लिखा हैं कि हर व्यक्ति को जीने और आजादी का अधिकार हैं।

ईमानदारी अक्सर मुश्किल होती हैं। किसी व्यक्ति को सच बोलने में सुरक्षित महसूस नहीं होता, तो वह सच नहीं बोलता, और लाइब्रेरी के कार्यकारिणी बैठक में किसी व्यक्ति को बैठकी के बारे में अन्यत्र बोलने को मनाही की जाती हैं, आखिर क्यों? यहाँ कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ हैं।

साधनों के बाबजूद सच्चे संवाद की कमी, नकारात्मक, और सर्जनात्मक समय का उपयोग न कर पाने से लोगों में बेचैनी बढ़ गई हैं। साफ व सीधी बात पब्लिक लाइब्रेरी कमेटी का पुनर्गठन हो। मात्र तीन वर्ष के लिए कमेटी बनाई गई थी जो आज ग्यारह साल से अधिक हो गए। अभी तक कमेटी द्वारा बॉयलॉज भी नहीं बनाया गया। नियम कानून को ताक पर रखकर न लाइब्रेरी का संरक्षण किया गया,न वहाँ पर पठन – पाठन व शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराया गया।

हाँ एक बात जरूर हुई कि लाभ के लिए लाइब्रेरी जैसी संस्था को विवाह – भवन अन्य कार्यक्रमों तथा मौज मस्ती का अड्डा बना दिया गया।

बिहार में ग्रामीण विकास के लिए भवन को प्राथमिकता मिल रहीं हैं। विवाह भवन सामाजिक आयोजनों और गरीबों की शक्तियों के लिए हैं, तो फिर चंद पैसों के प्रलोभन में पड़कर लाइब्रेरी जैसे संस्था को बन्द कर प्रत्येक लगन, शादी – विवाह तथा अन्य प्रायोजन के मौकों पर भाड़े पर देना कहाँ तक उचित हैं? लाइब्रेरी परिसर में शराब पीना और बोतल मिलना, अश्लील नृत्य एवं कार्यक्रम और बाल श्रम यह सभी भारतीय संस्कृति और नैतिकता के विरुद्ध हैं, और कानून का भी घोर उल्लंघन हैं।

डी जे पर सरकार के सख्त निर्देश के बाद भी यहाँ शादी – विवाह जैसे अनेकों मौकों पर देर रात तक डी जे बजाकर अश्लील नृत्य प्रदर्शित किया जाता रहा हैं।

जहाँ सरकारी तथा सार्वजनिक लाइब्रेरी काम नहीं कर रहा, वहाँ डिजिटल लाइब्रेरी तथा प्राइवेट लाइब्रेरी का विकल्प भी सामने आ रहा हैं। राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी के निर्माण से क्षेत्र के विधार्थियों को एक नई दिशा मिलनी चाहिए, और वे प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर सके। लाइब्रेरी पाठकों को एकाग्रता के साथ पढ़ने के लिए शांत प्रदान करता हैं।

तथा ज्ञान पिपासा को शांत करता हैं। वह स्थान जहाँ अध्ययन, ज्ञान वर्धन और संदर्भ के लिए पुस्तके, पत्र – पत्रिकाएं और अन्य पठन सामग्री व्यवस्थित रूप से रखी जाती हैं। यह ज्ञान का भंडार हैं, जहाँ लोग शांत वातावरण में पढ़ने, शोध करने और जानकारी हासिल करने के लिए आते हैं।

भारत में पत्रकारों को संविधान के अनुच्छेद 19 ( 1 ) ( a ) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत के रिपोर्टिंग का मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। मुख्य अधिकारों में में सूचना प्राप्त करने का अधिकार आर टी आई 2005 के तहत न्यूज़ सोर्स तथा खबर के स्रोत को गुप्त रखने का अधिकार और सार्वजनिक स्थानों पर निर्बाध रूप से रिपोर्टिंग करने की स्वतंत्रता शामिल हैं। जब कोई आलेख छिपे हुए तथ्यों या किसी के पक्षपात को सामने लाता हैं तो, हाँय – तौबा मचती हैं।

बिहार के मधुबनी जिले के राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी की कहानी दिखाने और बताने के पीछे एक मात्र वजह यह हैं कि सिर्फ एक संस्था के लूट, भ्र्ष्टाचार, व्यवस्था, पारदर्शिता उद्देश्य की कहानी कितनी भयावह हैं, यह जानना आवश्यक हैं।

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