प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
जल जीवन के लिए कितना आवश्यक है,यह गर्मी के समय में गुजरात और राजस्थान के निवासी ही अच्छी तरह बता सकते है! वैसे बड़े -बड़े शहरों में रहने वालों को प्रतिदिन कुछ न कुछ जल संकट से जूझना पड़ता है!
गर्मियों में तो पूछिये ही मत! पीना, खाना, पकाना, कपड़े धोना, घर सफाई करना, मवेशी को नहाना, पिलाना, कारखानों और सिचाई आदि कामों में प्रतिदिन जल की आवश्यकता होती है!वैसे आजकल बिहार के मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी सहित अन्य जिलों में भी पानी कि काफ़ी किल्ल्त महसूस की जा रही है!इसी जरुरत को देखते हुए देशी -विदेशी कंपनियों ने पेय जल में बेशुमार दौलत लगा रखी है!
शायद यही कारण है कि यहाँ पानी का व्यापारिक ग्राफ दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है! जिस वस्तु की बाटलिंग या पैकेजींग हो जाती है वह स्वत्:ही मॅहगी हो जाती है!ये कम्पनियां लोगों की जरूरतों को देख अपने मुनाफे के लिए इतनी तत्पर हैं कि लोगों को प्रभावित करने के लिए करोड़ों रूपये विज्ञापन पर खर्च कर देती हैं!
यही कारण हैं कि एक रूपये का पानी बाजार में 20 से 50 रुपये तक बिक जाता हैं!आश्चर्य की बात तो यह हैं कि जिस देश में गंगा, जमुना, सरस्वती जैसे अनेकों बड़े -बड़े पवित्र नदी,बहती हैं उस देश में पानी बिकती हैं बॉटल में वह भी मन मानी किम्मत पर!
आज जहाँ सरकार सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेय जल नहीं पहुंचा पाई हैं, वहाँ बोतलबंद पानी और पाउच वाटर राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दूरदर्शिता के कारण आसानी से उपलब्ध हैं!अपने देश के 5.8 लाख गांवों में 1.4 लाख गांवों को पानी नहीं मिल रहा हैं।
विश्व में प्रतिवर्ष लगभग सात करोड़ लोगों की मृत्यु जल की अनुपलब्धता से हो जाती हैं!एक सर्वेक्षण के मुताबिक आज विश्व के एक अरब लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं हैं! पर्यावरणविदों का मानना हैं कि मलमूत्र निष्पादन प्रणाली विकसित करके स्थानीय परिस्थितियों एवं आर्थिक साधनों के अनुकूल जल का प्रदूषण दूर किया जा सकता हैं! लेकिन अब चिन्ता की बात यह हैं कि हमारे देश की पंद्रह प्रमुख नदियों की जल ग्रहण क्षमता तेजी से घट रही हैं।
जो जल ग्रहण की स्थिति बची हैं उनमें पांच प्रतिशत शहरीकरण वाला क्षेत्र इन नदियों को इतना प्रदूषित कर दे रहा हैं कि बेलगाम आधुनिकता के कारण जल को पीना तो दूर,इसमें नहाना भी संक्रामक जोखिम बन गया हैं!हमारे देश की गंगा घाटों में आजादी के समय प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 6008 घन मीटर पानी उपलब्ध रहा करता था जो 1990 के दशक के अन्त में घटकर 2266 घन मीटर रह गया था!
2001 में पानी की उपलब्धता 1525 घन मीटर थी और 2026 तक घटकर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1060 घन मीटर हो जाने की आशंका जताई जा रही हैं!
इसका प्रमुख कारण देश की नियामक ह्रदयहीन नीतियाँ हैं,जो विश्व की मुफ्त बाजार व्यवस्था की ओर उन्मुख हैं!केरल राज्य के पालक्काड़ जिले के प्लाचीमडा गांव का उदाहरण आँखे खोलने वाला हैं!
यहाँ कोकाकोला कंपनी ने पानी का बाटलिंग संयन्त्र लगाया हैं! इसके लिए कम्पनी ने तीन सौ से चार सौ फिट गहरे साठ बोरवेल खोदे हैं,जो प्रतिदिन पंद्रह लाख लीटर पानी जमीन से खींच रहें हैं!इस कारण उस क्षेत्र के कुएं, पोखर, धान के खेत यहाँ तक कि बड़े -बड़े जलाशय सूखने लगे हैं!यह भारत सरकार की अदूरदर्शिता ही कहीं जा सकती हैं!
मिनरल वाटर और शीतल पेय के साथ -साथ लोगों को परिरक्षक के रूप में प्रयुक्त रासायन जैसे साईंट्रिक अम्ल, पोटेशियम मेटाबाई सल्फाईट, एसिटिक एसिड़, सोडियम बेंजोएट, सोडियम मेटा बाई -सल्फाइट आदि को भी अपने हलक के नीचे उतारना पड़ता हैं!
जैसा कि विगत वर्षो निर्धारित मानक से अधिक रसायन प्रयोग करने के कारण एक शीतल पेय कम्पनी को परीक्षण के दौर से गुजरना पड़ा था और मीडिया ने कलई खोल जनमानस में सनसनी पैदा कर दी थी! दुर्भाग्यबश पैसों के आगे सब ढाक के तीन पात के बराबर हो गया! कम्पनी आज भी मजे में अपना प्रोडक्ट बेच रही हैं और लोग धड़ल्ले से अपनी प्यास बुझा रहें हैं!
एक तरफ सरकार और सरकार को चलाने वाले लोग चंद रुपयों के लालच में आम लोगों के स्वास्थ्य की क़ीमत पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर अंकुश लगाने की बजाय संरक्षण दे रहें हैं तो दूसरी तरफ जल संकट पर गंभीर चिन्ता जताये जल संरक्षण के लिए जल संगठनों को मिलकर कार्य करने की प्रेरणा दे रहें हैं! आखिर यह कैसे हो सकता हैं कि तीर्थ यात्रा में मुक्त हाथों से दान दे और प्रशासनिक कारोबार में दोनों हाथों से राष्ट्रीय धन बटोरे
चीटियों को चीनी खिलायें और भोली भाली निरीह जनता का खून चूसने में व्यापार कौशल, राजनितिक कौशल का बखान करें!गंगा स्वर्ग के शीश से गिरी तो शिव की मूरघा पर, शिव के शीश से गिरी तो पर्वतों के उतूँग शिखरों पर, वहाँ से गिरी तो पृथ्वी पर!पृथ्वी से समुद्र तक पतित ही होती गई!
नेपाल में बरहा क्षेत्र बांध के निर्माण के लिए एक अध्ययन केन्द्र खुला हैं,जिसके लिए करीब तीस करोड़ का अनुदान भारत सरकार ने दिया था. केन्द्रीय मंत्रियों के जो बयान आते थे उनसे यह आभास होता हैं कि भारत ने नेपाल में बांध बनाने की मंजूरी दे दी थी,जबकि यह अधिकार तो नेपाल सरकार का हैं।
इतना तो तय हैं कि नेपाल में यह बांध नेपाल की मर्जी और भारत के व्यापारिक सहयोग तथा बिजली खरीदने की हामी और बांध के निर्माण के फलस्वरूप होने वाले विस्थापितों के पुनर्वास की पूरी पूरी क़ीमत दिए बिना नहीं बनने वाले हैं।
आमतौर पर देखा जाय तो नेपाल और बंगलादेश दोनों के ही पास आम भारतीयों से ज्यादा पानी उपलब्ध हैं l 2026 में भी नेपाल में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 8649 घन मीटर पानी और बंगलादेश में 4449 घन मीटर पानी रहेगा।
आज जरुरत हैं जल संरक्षण की और एक कारगर जल नीति की क्योंकि जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती हैं l















