भ्रष्टाचार पर राजनेताओं की चुप्पी और जनता”ये पब्लिक है, सब जानती है”
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
लोकतंत्र का सबसे अजीब दृश्य यही है। चौराहे पर खड़े होकर हर आदमी कहेगा “नेता सब चोर हैं, सिस्टम बिक गया है”। शाम को उसी आदमी के घर वोट मांगने नेता आएगा तो चाय पिलाएगा, फोटो खिंचवाएगा और फिर वही बटन दबा देगा। अगले दिन फिर वही शिकायत। ये सिलसिला सालों से चल रहा है।
भ्रष्टाचार कोई छिपी हुई चीज नहीं रही। सड़क बनेगी तो कमीशन, नौकरी लगेगी तो रेट, राशन मिलेगा तो कटौती, थाने में FIR लिखवानी हो तो मोलभाव। सबको पता है। अखबार भरा पड़ा है, टीवी पर डिबेट होती है, सोशल मीडिया पर मीम बनते हैं। लेकिन जब असल में बोलने की बारी आती है तो राजनेता चुप और जनता भी आधी चुप।
राजनेताओं की चुप्पी की वजह बहुत सीधी है। भ्रष्टाचार उनके लिए चुनाव लड़ने का ईंधन है। पोस्टर, बूथ मैनेजमेंट, भीड़ जुटाना, मीडिया खरीदना – ये सब पैसा मांगता है। और वो पैसा “ऊपर से नीचे” वाली व्यवस्था से ही आता है। अगर कोई नेता सच में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त हो जाए तो पार्टी फंड सूख जाएगा, कार्यकर्ता नाराज हो जाएंगे, अगला चुनाव हाथ से निकल जाएगा। इसलिए भाषण में “भ्रष्टाचार मिटाएंगे” का नारा और असल में फाइल आगे बढ़ाने के लिए “देख लेंगे” वाला रवैया। कोई किसी का नाम नहीं लेता क्योंकि कल उसे भी उसी सीढ़ी से चढ़ना है।
और जनता? जनता सब जानती है। ये लाइन अब मुहावरा बन गई है। पंचायत में कौन ठेका खा गया, विधायक निधि कहां गई, किस अफसर की जेब गर्म है – गांव का बच्चा बता देगा। फिर भी विरोध कमजोर क्यों है। पहली वजह है मजबूरी। जिसे रोजगार चाहिए, जिसे आवास चाहिए, जिसे बीमारी में हॉस्पिटल का बेड चाहिए, वो सिस्टम से उलझ नहीं सकता। “एक बार काम निकल जाए फिर देखेंगे” यही सोच उसे चुप कर देती है।
दूसरी वजह है थकान। शिकायत करो तो महीनों चक्कर, केस करो तो सालों तारीख, आवाज उठाओ तो धमकी। इतनी लड़ाई लड़ने की हिम्मत हर किसी में नहीं। तीसरी और सबसे खतरनाक वजह है आदत। धीरे-धीरे गलत को सहना आदत बन गया है। ₹100 देकर काम निकलवाना “सुविधा शुल्क” लगने लगा है। इस बीच एक खतरनाक समझौता हो गया है। नेता सोचता है जनता को मुफ्त की योजना दे दो, मंदिर-मस्जिद, जाति-धर्म की बात कर दो, वो भूल जाएगी। और जनता सोचती है चलो मेरा काम तो हो रहा है, दूसरे का क्या।
इसी सौदे में भ्रष्टाचार जिंदा है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब पानी सिर से ऊपर जाता है तो “ये पब्लिक है” वाली लाइन सच हो जाती है। बिहार में शिक्षक बहाली घोटाले पर सड़कें उतरीं। उत्तर प्रदेश में पेपर लीक पर छात्र सड़कों पर थे। महाराष्ट्र में दलाली के खिलाफ मोर्चा बना। तब नेताओं की चुप्पी टूटती है और फाइलें चलती हैं। इसका मतलब जनता सोई नहीं है, बस उसे लगता है अकेले आवाज उठाने से कुछ नहीं होगा।
असली बदलाव तब आएगा जब चुप्पी दोनों तरफ से टूटेगी। नेताओं को ये समझना होगा कि वोट सिर्फ जाति और मुफ्त से नहीं मिलता, इज्जत से मिलता है। और जनता को ये समझना होगा कि विरोध सिर्फ फेसबुक पर गाली देने से नहीं होता, RTI लगाने से होता है, शिकायत करने से होता है, गलत को वोट न देने से होता है।
लोकतंत्र दुकान नहीं है जहां ग्राहक आंख बंद करके सामान ले ले। यहां ग्राहक ही मालिक है। जब तक मालिक अपनी ताकत नहीं पहचानेगा, दुकानदार मनमानी करता रहेगा।
ये पब्लिक है सब जानती है” – इस लाइन को नारे से आगे ले जाकर एक्शन बनाना होगा। वरना अगली पीढ़ी भी यही कहेगी और यही सहेगी। और भ्रष्टाचार उसी चुप्पी की आड़ में पलता रहेगा।