राजनीति सेवा है या नौकरी?

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राजनीति सेवा है या नौकरी?

प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार राजनीति में कदम रखते ही हर आदमी सबसे पहले एक ही बात कहता है – “

मैं सेवा करने आया हूं”। ये लाइन इतनी बार बोली जाती है कि अब इसका मतलब ही खत्म हो गया है। मंच पर सेवा, पोस्टर पर सेवा, शपथ में सेवा। पर जैसे ही कुर्सी मिलती है, सेवा की भाषा बदल जाती है और सुविधा की भाषा शुरू हो जाती है।

अगर ये वाकई सेवा है तो फिर हर महीने बैंक में तनख्वाह क्यों आती है? अगर ये वाकई सेवा है तो पांच साल के लिए चुने जाने के बाद उम्र भर पेंशन क्यों तय है? अगर ये वाकई सेवा है तो बंगला, लाल बत्ती, सरकारी गाड़ी, स्टाफ, फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री हवाई यात्रा का इंतजाम क्यों है? सेवा करने वाले फकीर होते हैं, झोला लेकर चलते हैं। यहां झोला नहीं, काफिला चलता है।

और अगर ये नौकरी है तो फिर इस नौकरी का तरीका सबसे अजीब है। दुनिया की किसी भी नौकरी में जाने के लिए डिग्री चाहिए, परीक्षा देनी पड़ती है, इंटरव्यू होता है, ट्रेनिंग होती है। क्लर्क बनने के लिए भी फॉर्म भरना पड़ता है। पटवारी बनने के लिए दौड़ लगवाते हैं। बैंक में बाबू बनने के लिए घंटों टेस्ट होता है। पर देश चलाने की नौकरी के लिए बस एक शर्त है – उम्र 25 साल होनी चाहिए।

बस। इसके आगे न कोई पढ़ाई देखी जाती है न कोई चरित्र। चाहे आदमी आठवीं पास हो, चाहे उस पर दस केस चलते हों, चाहे उसे संविधान की एक लाइन न पता हो, चाहे बजट का मतलब न समझता हो – टिकट मिल गया तो वो कानून बनाएगा। वो तय करेगा कि तुम्हारे बच्चों की फीस कितनी होगी, तुम्हारे खेत का भाव क्या होगा, तुम्हारी दवा का रेट क्या होगा।

इसलिए ये न पूरी सेवा है न पूरी नौकरी। ये एक ऐसी दुकान है जिसके बाहर “जनसेवा” का बोर्ड लटका है और अंदर सत्ता का धंधा चलता है। यहां आने के लिए पूंजी चाहिए, बाहुबल चाहिए और सबसे जरूरी जाति का गणित चाहिए। जिसके पास ये तीनों हैं वो आराम से “सेवक” बन जाता है।

इस धंधे की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यहां जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं। किसी प्राइवेट कंपनी में तीन महीने काम खराब करो तो बॉस निकाल देता है। सरकारी नौकरी में हर साल CR बनती है। पर यहां पांच साल तक कोई पूछने वाला नहीं। सड़क नहीं बनी तो फंड का बहाना, अस्पताल में डॉक्टर नहीं तो सिस्टम का बहाना, वादा पूरा नहीं हुआ तो विपक्ष का बहाना। और पांच साल बाद फिर वही चेहरा नए वादे के साथ। जनता भी आदतन वोट देती है क्योंकि इस बार मुद्दा विकास नहीं, जाति है।

और कमाल देखिए, हार जाओ तो भी पेंशन चालू। इस्तीफा दे दो तो भी छह महीने तक सरकारी गाड़ी और बंगला। किसी केस में फंस भी जाओ तो अयोग्य होने तक सारी सुविधा।

दुनिया में कोई ऐसी नौकरी नहीं जहां काम न करो फिर भी तनख्वाह आती रहे।

इसका सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि राजनीति में योग्य लोग आने से डरते हैं। एक ईमानदार प्रोफेसर, एक अच्छा डॉक्टर, एक काबिल इंजीनियर चुनाव लड़ने से पहले सौ बार सोचता है। क्योंकि उसे पता है यहां मेहनत से नहीं, शोर से जीत होती है। यहां मुद्दों से नहीं, माहौल से जीत होती है। इसलिए मैदान खाली रह जाता है

और वही लोग कब्जा कर लेते हैं जिनके लिए राजनीति रोजगार का सबसे आसान तरीका है। हम जनता भी कम जिम्मेदार नहीं। हम उम्मीदवार से उसका विजन नहीं पूछते, उसका गोत्र पूछते हैं। हम उसका रिपोर्ट कार्ड नहीं मांगते, उसके बाप का नाम पूछते हैं। हम मंच पर विकास की बात करते हैं और बूथ पर पांच सौ में बिक जाते हैं। फिर पांच साल तक चिल्लाते हैं कि नेता खराब है। नेता खराब नहीं है, हमारा चुनाव खराब है।

अब वक्त आ गया है कि तय करना पड़ेगा। या तो इसे पूरी तरह नौकरी मान लो। तो फिर नियम बनाओ। न्यूनतम योग्यता तय करो, आपराधिक छवि वालों पर रोक लगाओ, हर साल काम और संपत्ति का ऑडिट हो, पांच साल बाद जनता के सामने रिपोर्ट कार्ड आए। परफॉर्मेंस खराब हो तो अगला टिकट कटे।या फिर इसे पूरी तरह सेवा मान लो। तो फिर सैलरी मत लो, पेंशन मत लो, बंगला मत लो।

गांधी और जयप्रकाश की तरह जियो। अगर वाकई जज्बा सेवा का है तो सुविधा का मोह छोड़ना पड़ेगा। पर अभी जो चल रहा है वो सबसे खतरनाक है। सुविधा नौकरी वाली, जिम्मेदारी सेवा वाली और जवाबदेही किसी की नहीं। इसी दोहरेपन ने राजनीति को बदनाम कर दिया है।

आखिर में बात सीधी है। राजनीति का मतलब राज्य का प्रबंधन होता है। प्रबंधन के लिए दिमाग चाहिए, पढ़ाई चाहिए, ईमानदारी चाहिए। पर आज राजनीति का मतलब बन गया है सत्ता का प्रबंधन। जहां सत्ता है वहां पैसा है, जहां पैसा है वहां अगली तीन पीढ़ी सेट है।

इसलिए अगली बार जब कोई वोट मांगने आए तो उससे पूछना। भाई तुम सेवा करने आए हो या सेटल होने? तुम्हारे पास प्लान है या सिर्फ प्रचार? तुम हिसाब दोगे या सिर्फ भाषण दोगे? जब तक हम ये सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक “सेवा” शब्द का इस्तेमाल इसी तरह होता रहेगा। और हम ताली बजाते रहेंगे और कहते रहेंगे कि राजनीति बहुत गंदी है। गंदी राजनीति नहीं है। गंदा वो सिस्टम है जिसे हम खुद चुनते हैं और फिर कोसते हैं।

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