नेताओं को पारदर्शिता से परहेज क्यों?

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प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बात यही है कि जनता मालिक है और नेता सेवक। पर हकीकत में अक्सर उल्टा दिखता है। मालिक दरवाजे पर खड़ा रह जाता है और सेवक अंदर से कुंडी लगा लेता है।

सवाल पूछो तो जवाब नहीं, हिसाब मांगो तो गुस्सा। फाइल खोलो तो फुसफुसाहट शुरू – “जरूरी नहीं है सब कुछ बताना”। आखिर नेताओं को पारदर्शिता से इतना परहेज क्यों है?

पारदर्शिता का मतलब बहुत सीधा है – शीशे की तरह साफ होना। पैसा कहां से आया, कहां गया, फैसला कैसे हुआ, ठेका किसे मिला, नियम क्या था। जब सब कुछ खुला होगा तो जनता को भरोसा होगा। पर यही भरोसा कई नेताओं को डरा देता है।

पहली वजह डर है। डर इस बात का कि अगर सब कुछ खुल गया तो पोल खुल जाएगी। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे और बाद में छोटे-छोटे समझौते। सरकारी योजनाओं का पैसा कागज पर कहीं और जमीन पर कहीं और। सड़क के बीच में नाला,

लाइब्रेरी में डांस-शराब, ग्यारह साल से बिना चुनाव कमेटी का कब्जा। ये सब तब तक चलता है जब तक कोई हिसाब न मांगे। जिस दिन RTI लगेगी, ऑडिट होगी, रजिस्टर खुलेगा, उसी दिन खेल बिगड़ जाएगा। इसलिए पारदर्शिता को “समय की बर्बादी” कहकर टाल दिया जाता है।

दूसरी वजह है सत्ता का नशा। सत्ता मिलते ही लगता है कि अब हमसे ऊपर कोई नहीं। फाइल हम चलाएंगे, नियम हम बनाएंगे, अपवाद भी हम ही तय करेंगे। पारदर्शिता इस नशे में दरार डालती है। वो याद दिलाती है कि आप अस्थायी हैं,

जनता स्थायी है। आपसे सवाल पूछा जाएगा। आपको जवाब देना होगा। कई नेता इस जवाबदेही से बचना चाहते हैं। उन्हें लगता है सवाल पूछना अविश्वास है, जबकि असल में सवाल न पूछा जाना ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

तीसरी वजह स्वार्थ का जाल है। राजनीति में अकेला कोई नहीं आता। उसके पीछे चंदा देने वाले, ठेका लेने वाले, जमीन खरीदने-बेचने वाले, रिश्तेदार और करीबी होते हैं। अगर सब कुछ पारदर्शी हो गया तो किसको क्या फायदा पहुंचा, ये भी सामने आ जाएगा। फिर “अपनों” को खुश करना मुश्किल हो जाएगा।

इसलिए फाइलों में पन्ने गायब हो जाते हैं, टेंडर की शर्तें बदल जाती हैं, बैठक की कार्यवाही नहीं लिखी जाती। अंधेरा रखना इसलिए जरूरी हो जाता है ताकि खेल आराम से खेला जा सके। और सबसे बड़ी वजह है जनता को कमजोर समझना। कई नेताओं को लगता है

जनता भूलक्कड़ है। चुनाव के बाद पांच साल तक कुछ याद नहीं रखेगी। दो-चार भाषण, दो-चार फोटो, एक-दो उद्घाटन और काम बन जाएगा। पारदर्शिता मांगने वाले को “नकारात्मक” कह दो, “विरोधी” कह दो, “सिस्टम को बदनाम करने वाला” कह दो। धीरे-धीरे लोग थक कर चुप हो जाते हैं। इसी चुप्पी से काले अंग्रेजों का राज चलता है।

पर सच्चाई ये है कि पारदर्शिता से डरने वाला नेता अंततः जनता से भी डरने लगता है। वो सवालों से कतराता है, कैमरे से बचता है, अखबार से नाराज रहता है। क्योंकि उसे पता है शीशे के सामने खड़े होते ही चेहरे का सच दिख जाता है।

राजनगर की पब्लिक लाइब्रेरी इसका उदाहरण है। ग्यारह साल से चुनाव नहीं, ऑडिट नहीं, आमसभा नहीं। प्रांगण में शादी, डांस, शराब और जब वीडियो वायरल हुआ तो भी चुप्पी। क्यों? क्योंकि अगर एक बार रजिस्टर खुल गया, बैंक का हिसाब मांग लिया गया, तो सबको पता चल जाएगा कि संस्था किसकी जागीर बन गई है। इसलिए फाइल दबा दो,

पत्रकार को नजरअंदाज कर दो, शिकायतकर्ता को थका दो।

पर जमाना बदल रहा है। अब जनता के हाथ में मोबाइल है, कलम है, RTI है। “सिटीजन आवाज” का वीडियो हो या प्रदीप कुमार नायक का आलेख, सच अब छुप नहीं रहा। नेता चाहे जितना परहेज कर लें, धूप को बोरी में बंद नहीं किया जा सकता।

पारदर्शिता किसी नेता की दुश्मन नहीं है। ये उसकी ढाल है। जो नेता साफ है, जिसका हिसाब साफ है, उसे डर किस बात का? पारदर्शिता से जनता का भरोसा बढ़ता है, सरकार की साख बढ़ती है, काम जल्दी होता है। परहेज करने से सिर्फ एक चीज बढ़ती है – संदेह।

आखिर में बात इतनी सी है। लोकतंत्र में कुर्सी किराए की होती है। किराएदार से मकान मालिक हिसाब मांगता ही है। अगर नेता को पारदर्शिता से परहेज है तो उसे समझ लेना चाहिए कि परहेज करने से सच नहीं मरता, सिर्फ भरोसा मरता है। और जिस दिन भरोसा मर गया, उस दिन कुर्सी भी नहीं बचती। इसलिए लड़ाई जारी रखनी होगी। आलेख लिखकर, सवाल पूछकर, RTI लगाकर। क्योंकि पारदर्शिता मांगना देशद्रोह नहीं है, देशभक्ति है।

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