मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी पर नई बहस
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
कहते हैं लोकतंत्र की चौथी दीवार मीडिया है। पर आज वही दीवार सबसे ज्यादा बहस में है। सवाल ये नहीं है कि मीडिया है या नहीं। सवाल ये है कि मीडिया बोल किसकी रही है, और किसकी चुप्पी साध रही है। इसी पर आज “अभिव्यक्ति की आजादी” को लेकर नई बहस छिड़ी है।
पहले मीडिया का मतलब था अखबार, रेडियो, टीवी। संपादक की कलम से हुकूमत की नींद उड़ती थी। पत्रकार गली में उतरता था, फाइल खंगालता था, सच छापता था। तब आजादी का मतलब सीधा था – बिना डर के सच बोलना।
आज तस्वीर बदल गई है। आज मीडिया का मतलब टीवी डिबेट, यूट्यूब चैनल, फेसबुक पेज, लोकल पोर्टल भी है। कैमरा हर हाथ में है। हर आदमी रिपोर्टर है। सूचना की बाढ़ है। पर इसी बाढ़ में सच डूब भी रहा है।
नई बहस की जड़ क्या है?*पहली बहस है “डर और दबाव” की। आज अगर कोई पत्रकार स्थानीय भ्रष्टाचार लिखे, लाइब्रेरी के घोटाले पर सवाल उठाए, नेताओं के हिसाब मांगे, तो उसके सामने तीन खतरे आ जाते हैं।
पहला कानूनी नोटिस, दूसरा सोशल मीडिया ट्रोलिंग, तीसरा विज्ञापन बंद। बड़े घराने वाले विज्ञापन खींच लेते हैं। छोटे पत्रकार पर FIR हो जाती है। ऐसे में संपादक खुद सोचता है “ये खबर जरूरी है या चैनल जरूरी है?” और यहीं से अभिव्यक्ति की आजादी पर कैंची चल जाती है।
दूसरी बहस है “शोर और सच” की। पहले खबर कम थी, पर गहरी थी। आज खबर 24 घंटे है, पर सतह की है। डिबेट में शोर इतना कि मुद्दा गायब।
एक तरफ देशभक्ति, दूसरी तरफ देशद्रोह। बीच में लाइब्रेरी, सड़क, नाला, ऑडिट की बात कोई नहीं करता। क्योंकि TRP शोर से आती है, सच से नहीं। तो पत्रकार भी मजबूर है। उसे पता है अगर उसने “राष्ट्रवाद के चोले में आई एस आई” जैसे मुद्दे उठाए तो चैनल कहेगा “इससे रेटिंग नहीं मिलेगी”।
तीसरी बहस है “पैसे और पत्रकारिता” की। मीडिया को चलाने के लिए पैसा चाहिए। पैसा सरकार से, कॉरपोरेट से, पार्टी से। अब सोचिए जिस हाथ से पैसा आ रहा है उसी हाथ की उंगली कैसे तोड़ेंगे? इसलिए कई बार खबर रोक दी जाती है।
शब्द बदल दिए जाते हैं। “घोटाला” की जगह “अनियमितता” लिख दिया जाता है। और जब छोटे स्तर पर प्रदीप कुमार नायक जैसे पत्रकार 15 आलेख लिखते हैं, तो उन्हें “नकारात्मक” का तमगा दे दिया जाता है।चौथी बहस सबसे खतरनाक है – “जनता का अविश्वास”।
सोशल मीडिया ने हर किसी को पत्रकार बना दिया। कोई वीडियो डाल देता है, कोई अफवाह फैला देता है। असली पत्रकार और नकली में फर्क मिट गया।
अब जनता भी कहती है “सब बिके हुए हैं”। जब भरोसा ही टूट गया तो अभिव्यक्ति की आजादी का क्या मतलब? तो क्या अभिव्यक्ति की आजादी खत्म हो गई l
नहीं। खत्म नहीं हुई, उसकी शक्ल बदल गई है। आज आजादी का मतलब सिर्फ सरकार के खिलाफ बोलना नहीं है। आजादी का मतलब है भीड़ के खिलाफ बोलना। ट्रेंड के खिलाफ बोलना। अपने ही मालिक के खिलाफ बोलना।
सिटीजन आवाज” ने राजनगर लाइब्रेरी का वीडियो वायरल किया। ये अभिव्यक्ति की आजादी है। प्रदीप कुमार नायक ने 15 आलेख लिखे। ये अभिव्यक्ति की आजादी है। आपने RTI लगाई। ये भी अभिव्यक्ति की आजादी है।
खतरा ये है कि अब इस आजादी को “साजिश”, “प्रोपेगेंडा”, “एजेंडा” कहकर दबाया जा रहा है। अब रास्ता क्या है? मीडिया को तय करना होगा कि वो आईना है या ढोल।
आईना बनेगा तो कड़वा सच दिखाना पड़ेगा। ढोल बनेगा तो सिर्फ शोर करेगा।
सरकार को तय करना होगा कि आलोचना दुश्मनी नहीं है। RTI पूछना देशद्रोह नहीं है। वीडियो वायरल होना अपराध नहीं है। अगर मीडिया डर-डर कर लिखेगी तो लोकतंत्र लंगड़ा हो जाएगा।
और सबसे जरूरी, जनता को तय करना होगा कि वो क्या देखना चाहती है। डिबेट में गाली या जमीन पर काम? फर्जी राष्ट्रवाद या असली हिसाब? जब तक हम TRP को वोट देंगे, मीडिया वही परोसेगी।
निष्कर्ष अभिव्यक्ति की आजादी कागज पर लिखे अनुच्छेद से नहीं चलती। वो चलती है हिम्मत से। उस पत्रकार की हिम्मत से जो बिना विज्ञापन की परवाह किए सच लिखे। उस नागरिक की हिम्मत से जो वीडियो बनाकर सवाल पूछे। उस संपादक की हिम्मत से जो दबाव में झुके नहीं।
नई बहस इसी बात की है। क्या हम ऐसी मीडिया चाहते हैं जो सत्ता को खुश रखे, या ऐसी मीडिया जो जनता को जागरूक रखे।
आखिरी लाइन यही है। कलम की स्याही अगर डर से सूख गई, तो लोकतंत्र की सांस भी धीमी पड़ जाएगी। इसलिए बहस जरूरी है। सवाल जरूरी है। और सच बोलना सबसे ज्यादा जरूरी हैं l