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क्रांति का पथ सुगम नहीं सुलगता यह अंगारों से

शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक। शाहपुरा-तेजपाल उपाध्याय की अध्यक्षता और बाबूलाल चौहान के विशिष्ट आतिथ्य में अखिल भारतीय साहित्य परिषद शाहपुरा इकाई की क्रांतिवीर सावरकर विषय पर..

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शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक। शाहपुरा-तेजपाल उपाध्याय की अध्यक्षता और बाबूलाल चौहान के विशिष्ट आतिथ्य में अखिल भारतीय साहित्य परिषद शाहपुरा इकाई की क्रांतिवीर सावरकर विषय पर मासिक साहित्यिक गोष्ठी संपन्नमधुकर भवन संघ कार्यालय पर साहित्य परिषद की गोष्ठी में कवियों ने बिखेरे क्रांति के शाब्दिक रंग।

गोष्ठी की शुरुआत तेजपाल उपाध्याय ने सरस्वती वंदना ‘मां सरस्वती हे शारदे अभिव्यक्ति का मुझे भाव दे’ से की। कवि डॉ. परमेश्वर कुमावत ‘परम’ ने ‘सावरकर जो नाम बड़ा ही पावन है भारत भूमि के पुत्रों के मनभावन है’ कविता सुनाकर सावरकर के जीवन पर प्रकाश डाला।

डॉक्टर कमलेश पाराशर ने ‘जल उठे थे दीप हजारों जब क्रांति की आई बयार’ कविता सुनाई। वरिष्ठ गीतकार बालकृष्ण जोशी ‘बीरा’ ने देशभक्ति गीत ‘देश हमारा प्राणों से प्यारा धरती पर इसको स्वर्ग से उतारा’ सुनाकर गोष्ठी को संगीतमय कर दिया।

सी.ए. अशोक बोहरा ने ‘काल कोठरी की काली रातों में वह दीप जलता रहा’ कविता सुनाकर सावरकर के बलिदान को याद किया। एडवोकेट दीपक पारीक ने ‘अंडमान की काली कोठरियों में जिसने सूर्य उगाया था’ कविता सुनाकर वीर सावरकर के भारत की आजादी में योगदान को शब्दों में व्यक्त किया। संस्था के अध्यक्ष तेजपाल उपाध्याय ने ‘पहल करने से ही विशिष्टता की पहचान बनती है’ कविता सुनाकर क्रांतिकारियों के द्वारा की गई आजादी की पहल को नमन किया।

संस्था के महामंत्री ओम माली ‘अंगारा’ ने ‘क्रांति का पथ सुगम नहीं सुलगता यह प्रज्वलित अंगारों से’ कविता सुनाकर क्रांति से होने वाले परिवर्तनों को रेखांकित किया। रवीद्र सिंह जाड़ावत ने ‘सन सत्तावन याद रहेगा याद रहेगी कुर्बानी’ कविता सुनाकर 1857 की क्रांति में झांसी की रानी के योगदान को शब्दों में अभिव्यक्त किया।

आशुतोष सिंह सोदा ने ‘मैं सिंधु सुता विस्तृत हिमगिरी का अटल भाल हूं’ कविता सुनाकर गोष्ठी को ओजमय कर दिया। विश्राम मेघवंशी ‘विष’ ने राजस्थानी भाषा में ‘सुणो सुणाउँ सुणल्यो आज अंगरेजां रा काळा काज’ कविता सुनाकर भारतीय जनता और राजाओं पर अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचारों को शब्दों में व्यक्त किया।

गोष्ठी के अंत में बाबूलाल चौहान ने ‘सब इंतजार में थे आए ना लेकर पैमाना’ कविता सुनाई।

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