काले अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई

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प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

अंग्रेजों ने जब देश छोड़ा था तो हमने सोचा था अब आजादी की सांस लेंगे। लाल किले से ऐलान हुआ, संविधान बना, वोट का अधिकार मिला। पर कुछ ही सालों में समझ आ गया कि अंग्रेज तो चले गए, उनकी नकल करने वाले यहीं रह गए। वर्दी बदल गई, भाषा बदल गई, पर हुकूमत का लहजा वही रहा। उसी को हम काले अंग्रेज कहते हैं।

काले अंग्रेज कोई एक आदमी नहीं है। ये एक आदत है, एक सोच है। सत्ता मिलते ही जो अपने को जनता का सेवक न समझकर मालिक समझने लगे, वो काला अंग्रेज है। जो कुर्सी पर बैठते ही ये भूल जाए कि जनता ने उसे पांच साल के लिए चुना है, राज करने के लिए नहीं, वो काला अंग्रेज है। जो फाइल पर कलम चलाने के बदले हाथ फैलाए, जो गरीब के काम को महीनों लटकाए और रिश्वत मिलते ही रातों-रात कर दे, वो काला अंग्रेज है।

जो सार्वजनिक संपत्ति को अपनी जागीर समझे और वहां किताब की जगह शराब, ज्ञान की जगह अश्लीलता परोसे, वो काला अंग्रेज है।

गोरे अंग्रेज टैक्स के नाम पर खून चूसते थे। काले अंग्रेज कमीशन के नाम पर चूसते हैं। गोरे अंग्रेज लाठी और जेल से डराते थे। काले अंग्रेज सिस्टम और बदनामी से डराते हैं। गोरे अंग्रेज कहते थे तुम गुलाम हो। काले अंग्रेज मुस्कुराकर कहते हैं तुम वोटर हो, पर सवाल मत पूछना। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जंजीर बाहर दिखती थी, अब अंदर पहनाई जाती है।

इसकी सबसे जीती-जागती मिसाल हमारे आसपास ही मिल जाएगी। राजनगर की पब्लिक लाइब्रेरी कभी ज्ञान का मंदिर थी। बच्चे वहां किताब पढ़ने जाते थे। बूढ़े अखबार पढ़ने जाते थे। पर धीरे-धीरे उस मंदिर के पुजारी ही उसे बाजार बना बैठे। ग्यारह साल से एक ही कमेटी काबिज है। चुनाव का नाम नहीं। ऑडिट का नाम नहीं। आय-व्यय का हिसाब मांगो तो मुंह फेर लिया जाता है।

और जब यही नहीं काफी था तो लाइब्रेरी का प्रांगण शादी-ब्याह और अश्लील डांस के लिए किराए पर चढ़ा दिया गया। सिटीजन आवाज चैनल पर उसका वीडियो वायरल हुआ तो भी किसी की पेशानी पर शिकन नहीं आई। क्योंकि उन्हें पता है कोई कुछ नहीं बोलेगा। बोलेगा भी तो क्या कर लेगा।

यही सोच काले अंग्रेजी राज की नींव है। सड़क के बीच में नाला बना दो। सरकारी जमीन खोद दो। और जब कोई पूछे तो कह दो तुमको क्या मतलब। मतलब इसलिए है क्योंकि ये पैसा मेरा है, ये जमीन मेरी है, ये संस्था मेरी है। हम मालिक हैं, ये नौकर हैं। पर ये बात कहने की हिम्मत कोई नहीं करता।

1857 में लड़ाई बंदूक से लड़ी गई थी। भगत सिंह ने बम फेंका था। गांधी ने सत्याग्रह किया था। आज की लड़ाई की शक्ल बदल गई है। आज बंदूक की जगह कलम है। बम की जगह RTI है। और सत्याग्रह की जगह कैमरा है। आज अगर हम 15 आलेख लिखते हैं तो ये छोटी बात नहीं है। हर आलेख एक गोली है जो सच की तरफ दागी गई है। हर RTI एक सवाल है जो सत्ता की कुर्सी हिलाता है। हर वायरल वीडियो एक आईना है जो काले अंग्रेजों का चेहरा जनता के सामने रख देता है।

पर लड़ाई आसान नहीं है। काले अंग्रेज जानते हैं कि अगर जनता एक हो गई तो उनकी दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए वो हमें आपस में लड़वाते हैं। जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, पार्टी के नाम पर। ताकि हम लाइब्रेरी, सड़क, नल-जल भूलकर आपस में उलझे रहें। उनकी दूसरी चाल है थका देना। आप शिकायत करो, वो फाइल दबा देंगे। आप आलेख लिखो, वो अनसुना कर देंगे। आप RTI लगाओ, वो 30 दिन घुमाएंगे। मकसद सिर्फ एक है कि आप हार मानकर चुप हो जाओ।

इसीलिए सबसे जरूरी है चुप न होना। प्रदीप कुमार नायक जैसे पत्रकार जब पंद्रह – बीस आलेख लिखते हैं तो वो अकेले नहीं लिख रहे होते। वो उस हर आदमी की आवाज बनते हैं जो भीतर से घुट रहा है पर बोल नहीं पा रहा। जब हम RTI लगाते हैं तो हम भीख नहीं मांग रहे होते। हम अपना हक मांग रहे होते हैं। जब आप वीडियो बनाते हैं तो आप तमाशा नहीं कर रहे होते। हम सबूत जमा कर रहे होते हैं।

काले अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई का मतलब किसी से नफरत नहीं है। इसका मतलब है उस व्यवस्था से नफरत है जो कहती है कि हम जो करेंगे वो सही है, तुम बस ताली बजाओ। इसका मतलब है ये याद दिलाना कि लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पांच साल में वोट देना नहीं है। लोकतंत्र का मतलब रोज सवाल

पूछना है। रोज जवाब मांगना है। रोज हिसाब लेना है। आजादी के 79 साल बाद भी अगर लाइब्रेरी में किताबों की जगह शराब की बोतल मिले, अगर सड़क पर चलने की जगह गड्ढे मिले, अगर सवाल पूछने पर धमकी मिले, तो समझ लीजिए आजादी अधूरी है। राजनीतिक गुलामी गई है, पर मानसिक गुलामी अभी बाकी है।

इसलिए ये लड़ाई लंबी है। पर इसे लड़ना ही होगा। क्योंकि इतिहास गवाह है कि कोई भी तानाशाही हमेशा नहीं टिकती। गोरे अंग्रेज 200 साल बाद गए। काले अंग्रेज भी एक दिन जाएंगे। जब जनता जाग जाएगी। जब कलम बिकना बंद हो जाएगी। जब RTI का जवाब देने से लोग डरने लगेंगे।

अंत में सिर्फ एक बात। डरिए मत। थकिए मत। “ये पब्लिक है, सब जानती है”। और जिस दिन पब्लिक बोलना शुरू कर देगी, उस दिन काले अंग्रेजों की कुर्सी अपने आप हिल जाएगी।

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