धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: सरकार के लिए चेतावनी, व्यवस्था के लिए सबक​

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प्रदीप कुमार नायकस्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार​

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देकर सिर्फ एक पद नहीं छोड़ा, उन्होंने पूरे सिस्टम को आईना दिखा दिया है। युवाओं के नाम लिखे भावुक पत्र में उन्होंने कहा कि वे नहीं चाहते कि छात्रों का भविष्य कानूनी विवादों में उलझे। त्यागपत्र प्रधानमंत्री को सौंपते हुए उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रसेवा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी।

ये शब्द साधारण नहीं हैं। ये उन लाखों छात्रों की पीड़ा की गूंज हैं जो पिछले एक साल से पेपर लीक, रिजल्ट में गड़बड़ी और जवाब न मिलने से तड़प रहे थे। ​सच कहें तो यह इस्तीफा बहुत देर से आया। नीट-यूजी का पेपर लीक हुआ, सीबीएसई की कॉपी चेकिंग पर सवाल उठे, यूजीसी-नेट रद्द करना पड़ा। हर बार सरकार ने कहा “जांच होगी”, “कड़ी कार्रवाई होगी”।

लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला। छात्र सड़क पर उतरे, जंतर-मंतर पर धरना हुआ, सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। कॉकरोच जनता पार्टी ने डेडलाइन दी, इंडिया गठबंधन ने संसद में हंगामा किया। फिर भी मंत्रालय का रवैया था “सब ठीक है”। आखिरकार जब दबाव हद से बढ़ा तो एक मंत्री को आगे आकर नैतिक जिम्मेदारी लेनी पड़ी। सवाल यह है कि यह जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति की थी या पूरी व्यवस्था की? ​धर्मेंद्र प्रधान का पत्र पढ़कर लगता है कि उन्हें भीतर से तकलीफ थी। उन्होंने लिखा कि लोकतंत्र और युवाओं की शक्ति पर उनका भरोसा अटूट है।

लेकिन भरोसा भाषणों से नहीं, फैसलों से बनता है। जब एनटीए (NTA) बार-बार फेल हो रहा था, जब पेपर लीक के बाद भी जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई नहीं हो रही थी, तब मंत्रालय ने आंख क्यों बंद रखी? नई शिक्षा नीति के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन नीति लागू करने वाली मशीनरी ही जंग खा गई। प्रधान ने अकेले इस्तीफा देकर कुर्सी की मर्यादा बचा ली, लेकिन सरकार को यह सोचना होगा कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की मर्यादा कौन बचाएगा? सरकार के लिए तीन बड़े सबक​यह इस्तीफा सरकार के लिए सीधा सबक है: ​पहला सबक – युवाओं को हल्के में मत लीजिए: आज का छात्र सोशल मीडिया का छात्र है। उसे झूठे आश्वासन से बहलाया नहीं जा सकता। नीट में 24 लाख बच्चे बैठते हैं।

उनके एक-एक नंबर के पीछे माता-पिता का कर्ज और सालों की मेहनत होती है। जब सिस्टम उनके साथ धोखा करता है तो गुस्सा फूटता ही है। ​दूसरा सबक – जवाबदेही तय कीजिए: पेपर लीक हुआ तो सिर्फ छात्रों को दोषी बताकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। एनटीए के चेयरमैन से लेकर सेंटर के इंचार्ज तक, सबकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। ​तीसरा और सबसे बड़ा सबक – सुधार दिखावे के लिए नहीं, ईमानदारी से कीजिए: परीक्षा प्रणाली में टेक्नोलॉजी लाइए, पेपर की सुरक्षा बढ़ाइए, मूल्यांकन में

पारदर्शिता लाइए। वरना हर साल कोई न कोई मंत्री इस्तीफा देता रहेगा और समस्या जस की t जस रहेगी। ​प्रधान ने पत्र के अंत में कहा कि राष्ट्रसेवा जारी रहेगी। यह अच्छी बात है। लेकिन अब गेंद सरकार के पाले में है। नए शिक्षा मंत्री को आते ही तीन काम करने होंगे—एनटीए का ढांचा बदलना होगा, पेपर लीक में शामिल माफिया पर शिकंजा कसना होगा, और सबसे जरूरी, छात्रों से सीधा संवाद करना होगा। बंद कमरे में नीति बनाकर ट्वीट कर देने से काम नहीं चलेगा।

छात्रों को भरोसा दिलाना होगा कि अगली परीक्षा में उनके साथ धोखा नहीं होगा।राजनीति में इस्तीफे कम होते हैं। ज्यादातर लोग कुर्सी से चिपके रहते हैं। इसीलिए धर्मेंद्र प्रधान का यह कदम चर्चा में है। लेकिन इसे महिमामंडन का विषय न बनाया जाए। इसे आत्मचिंतन का मौका बनाया जाए। सरकार को सोचना होगा कि एक मंत्री के इस्तीफे से समस्या खत्म नहीं होती। समस्या तब खत्म होगी जब गांव का आखिरी छात्र भी यह कह सके कि “हां, अब परीक्षा में धांधली नहीं होगी।”

​अंत में वही बात। लोकतंत्र पर भरोसा तभी रहता है जब लोकतंत्र जवाब देता है। छात्रों ने सवाल पूछा था। प्रधान ने इस्तीफे से जवाब दिया। अब सरकार को नीतियों से जवाब देना है। वरना अगला इस्तीफा किसी और का होगा, और अगला आंदोलन और बड़ा होगा।

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