……. “बा मुलाजिम होशियार” व्यवस्था की हकीकत को देखना है तो किसी गांव में चले जाइए
प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
शहरों में फाइलें साफ-सुथरी रहती हैंl प्रेजेंटेशन चमकते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत डिजिटल हो गया, हर घर में योजना पहुंच गई, हर समस्या का समाधान एक क्लिक पर है। लेकिन अगर व्यवस्था की असली तस्वीर देखनी है तो एसी छोड़िए और किसी गांव की कच्ची सड़क पर उतर जाइए। वहां कागज पर लिखी सरकार और जमीन पर चलती सरकार के बीच का फर्क खुद-ब-खुद दिख जाएगा। गांव के चौक पर पंचायत भवन बना होगा। रंग नया, ताला नया। अंदर कुर्सी पर “मुखिया ” का नाम लिखा होगा। पर पूछिए तो पता चलेगा मुखिया महीने में एक बार आते हैं। बाकी दिन उनकी जगह उनका पति, भाई या मुंशी बैठता है। रजिस्टर वही भरता है, साइन वही करवाता है, ठेकेदार से बात वही करता है। इसे गांव वाले “प्रॉक्सी” कहते हैं। कानून कहता है महिला सशक्तिकरण, हकीकत कहती है कुर्सी महिला की और कलम पुरुष की।
आगे बढ़िए तो आंगनबाड़ी दिखेगी। दीवार पर लिखा होगा “बच्चों के लिए पोषाहार”। अंदर दो-तीन बच्चे बैठे होंगे। सेविका कहेगी अनाज आया ही नहीं। गोदाम में रजिस्टर भरा मिलेगा, लेकिन बर्तन खाली। पूछिए तो जवाब मिलेगा “ऊपर से माल नहीं आया”। कौन ऊपर है, ये कोई नहीं बताता। बस सबकी गर्दन झुकी हुई मिलेगी।
स्कूल की घंटी बजेगी। मास्टर साहब आएंगे, हाजिरी लगेगी। बच्चे होंगे पर पढ़ाई नहीं होगी। मिड-डे मील के नाम पर दाल में पानी और चावल में कंकड़। शिकायत करो तो कहा जाएगा “आपको क्या करना है, नौकरी करनी है या राजनीति”। ट्रांसफर का डर सबको चुप करा देता है।
अस्पताल का बोर्ड जरूर चमकेगा “24 घंटे सेवा”। अंदर जाइए तो एक कंपाउंडर मिलेगा और दवाइयों की अलमारी खाली। एक्सरे मशीन है पर चलाने वाला नहीं। डॉक्टर साहब सप्ताह में दो दिन आते हैं, वो भी दो घंटे। मरीज को अगर बचना है तो शहर के प्राइवेट नर्सिंग होम जाना ही पड़ेगा। सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए दलाल बैठा मिलेगा जो “फीस” लेकर आपका काम करवाएगा।
सबसे बड़ी हकीकत नल-जल योजना में दिखती है। हर घर नल का वादा। पाइप बिछ गए, मीटर लग गए, फोटो खिंच गई। लेकिन नल से पानी नहीं आता। मोटर खराब है, बिजली नहीं है, ऑपरेटर को तनख्वाह नहीं मिली। फिर भी रिपोर्ट में 100 प्रतिशत कवरेज।
यहां भ्रष्टाचार शोर नहीं करता। वो चुपचाप चलता है। रोजमर्रा का हिस्सा बन गया है। राशन डीलर तोल में कटौती करेगा और कहेगा “ऊपर तक देना पड़ता है”। जमीन का दाखिल-खारिज करवाना है तो वकील नहीं, मुंशी का रेट पूछना पड़ेगा। मनरेगा में काम के नाम पर हाजिरी बन जाएगी पर मजदूर घर बैठा रहेगा।
इस सबके बीच गांव का आम आदमी सबसे ज्यादा होशियार है। वो जानता है किससे क्या कहना है, किसकी जेब कितनी गर्म करनी है, किसके सामने रोना है। “बा मुलाजिम होशियार” इसी का दूसरा नाम है। यहां हर कोई व्यवस्था को जानता है, समझता है, और उसी के हिसाब से जीना सीख गया है।
शहर में बैठे अफसरों को लगता है सब ठीक चल रहा है क्योंकि रिपोर्ट में सब हरा है। लेकिन गांव की मिट्टी बताती है कि योजना और क्रियान्वयन के बीच कितनी बड़ी खाई है। वो खाई भरी जाती है लापरवाही से, कमीशन से और “कोई नहीं पूछेगा” वाली सोच से।
इसका मतलब ये नहीं कि गांव में सब बुरा है। बदलाव भी यहीं से शुरू होते हैं। कोई महिला मुखिया खुद फाइल चलाती है। कोई शिक्षक बिना तनख्वाह के बच्चों को पढ़ाता है। कोई युवा RTI लगाकर घोटाला पकड़ता है। लेकिन ये अपवाद हैं। नियम अभी भी वही है।
व्यवस्था को आईना दिखाना है तो मंत्रालय की वेबसाइट मत खोलिए। किसी गांव में चले जाइए। पंचायत भवन के बाहर बैठकर लोगों की बात सुनिए। स्कूल के बच्चों से पूछिए कल क्या खाया था। अस्पताल के बाहर खड़े मरीज से पूछिए डॉक्टर कब आएंगे। तीन दिन में समझ आ जाएगा कि फाइलों पर चलने वाला भारत और जमीन पर जीने वाला भारत दो अलग देश हैं।
जब तक इस फर्क को मिटाया नहीं जाएगा, तब तक “बा मुलाजिम होशियार” की तख्ती हर सरकारी दफ्तर पर लटकी रहेगी। और व्यवस्था वही रहेगी – कागज पर शानदार, जमीन पर लाचार।