शिक्षा, संस्कार और स्नेह का अनूठा संगम बना मातृ सम्मेलन”सरस्वती विद्या मंदिर भरतगढ़ में मनाया गया मातृ सम्मेलन
दतिया। सरस्वती विद्या मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भरतगढ़ में मातृ सम्मेलन सह मासिक परीक्षा का परीक्षा फल वितरण कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि श्रीमती भावना परिहार (विद्या भारती प्रांतीय कार्यकारिणी सदस्य एवं भांडेर स्वामी विवेकानंद शिक्षा समिति उपाध्यक्ष) तथा विशिष्ट अतिथि श्रीमती मंजू गुप्ता (पूर्व आचार्य
भरतगढ़), श्रीमती आकांक्षा तिवारी(विभाग प्रमुख शिशु वाटिका, प्रधानाचार्य बालाजी नगर), श्रीमती सरिता खरे (विद्यालय शिशु वाटिका प्रमुख) के द्वारा संयुक्त रूप से विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती, भारत माता और सृष्टि के गर्भस्थल ओउम् की तस्वीर के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर एवं पुष्पार्चन कर सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया। अतिथि परिचय श्रीमती सुनीता श्रीवास्तव दीदी द्वारा कराया गया एवं अतिथि स्वागत श्रीमती एकता शर्मा एवं श्रीमती निधि दुबे तथा श्रीमती सुनीता पटेल द्वारा किया गया ।
मुख्य अतिथि श्रीमती भावना परिहार द्वारा अपने उद्बोधन में कहा गया कि एक बच्चे की पहली पाठशाला उसका घर होता है। उसकी पहली शिक्षक उसकी मां होती है। मां और बच्चे का रिश्ता दुनिया का सबसे अनमोल रिश्ता है। लेकिन आज के आधुनिक युग में, इस रिश्ते में आपसी तालमेल और समन्वय होना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
मां और बच्चे के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए हमें कुछ मुख्य बातों पर ध्यान देना होगा (1) बच्चे से सिर्फ निर्देश न दें, उसकी बात भी सुनें। रोज कम से कम 15 मिनट बच्चे से खुलकर बात करें। (2)व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय सिर्फ बच्चे के लिए निकालें। उस समय न मोबाइल हो, न टीवी।(3)हर बच्चा खास होता है। उसकी तुलना किसी दूसरे बच्चे से करके उसका मनोबल न गिराएं।(4) बच्चे के साथ एक दोस्त की तरह पेश आएं, ताकि वह अपनी हर छोटी-बड़ी बात आपसे साझा कर सके।
(5) बच्चा जब कोई गलती करे, तो गुस्सा करने के बजाय उसे प्यार से सही और गलत का अंतर बताएं। जब एक मां और बच्चे के बीच सही समन्वय होता है, तो बच्चे का मानसिक, भावनात्मक और शैक्षणिक विकास बहुत तेजी से होता है बच्चों के विकास में माता की भूमिका अहम होती है।
साथ में ही घर के संस्कार एवं विद्यालय की शिक्षा के साथ, बालक की आदर्श दिनचर्या व आहार-विहार और हमारे द्वारा बच्चों को का शिक्षण एवं गृह कार्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। श्रीमती भावना परिहार ने भैया-बहन संस्कार व संस्कृति की जानकारी देते हुए माता-बहनों को सात्विक विचारों और आहार-विहार का ध्यान रखने की बात कही।
उन्होंने माता जीजाबाई, लक्ष्मी बाई, रानी दुर्गावती, सीता, सावित्री, लक्ष्मी एवं दुर्गा के उदाहरण देकर माताओं को अवगत करायावहीं विशिष्ट अतिथि श्रीमती मंजू गुप्ता जी ने बताया किपरिवार को फिर से जोड़ना और उनमें अच्छे संस्कार जगाना है। इसके तहत हफ्ते में एक बार पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन करता है, बातचीत करता है और अपनी भाषा, वेशभूषा, संस्कृति तथा देश-समाज के बारे में चर्चा करता है। यह नई पीढ़ी को अपने मूल्यों से जोड़ने का एक माध्यम है।
हफ्ते में कम से कम एक बार सब मिलकर बैठें और बिना किसी तनाव के आपस में खुलकर बातें करें।घर के अंदर अपनी मातृभाषा, पारंपरिक पहनावे, घर के बने भोजन और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाना परिवार को सिर्फ अपने तक सीमित न रखकर समाज और देश के प्रति संवेदनशील बनाना, जैसे जरूरतमंदों की मदद करना।
इस मातृ सम्मेलन की अध्यक्षता शिशु वाटिका की विभाग प्रमुख श्रीमती आकांक्षा तिवारी द्वारा की गई एवं अतिथियों का आभार विद्यालय के प्राचार्य कपिल जी तांबे द्वारा व्यक्त किया गया एवं कार्यक्रम का संचालन श्रीमती सीता सक्सेना दीदी के द्वारा किया गया इस मातृ सम्मेलन में बड़ी संख्या में माताओं-बहनों के साथ-साथ विद्यालय की समस्त दीदीयाॅ उपस्थिति रही ।