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RSS नागपुर में एक छोटे समूह से बढ़कर अब पूरे भारत और वैश्विक स्तर पर सक्रिय- जाने हिस्ट्री

आर एस एस की हिन्दुत्त्व के सौ साल प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सौ वर्ष पूर्ण हो गए l समाज में व्याप्त होकर संघ समाज में संस्कार और देश भक्ति का संचार अनंत काल तक करते हुए देश के लिए समर्पित रहेगा l राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी…

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आर एस एस की हिन्दुत्त्व के सौ साल

प्रदीप कुमार नायक

स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सौ वर्ष पूर्ण हो गए l समाज में व्याप्त होकर संघ समाज में संस्कार और देश भक्ति का संचार अनंत काल तक करते हुए देश के लिए समर्पित रहेगा l

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी शताब्दी यात्रा यानि सौ वर्षो की यात्रा केवल संगठन के परिश्रम की नहीं, बल्कि समाज के सहयोग और सहभागिता की भी देन हैं l दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के रूप में, इसने एक अनूठी संगठनात्मक संरचना और स्व-निर्भर वित्तीय मॉडल विकसित किया है। यह संगठन नागपुर में एक छोटे समूह से बढ़कर अब पूरे भारत और वैश्विक स्तर पर सक्रिय है।

स्थापना और प्रारंभिक विकास आरएसएस की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 27 सितंबर 1925 की विजयादशमी के दिन नागपुर में की थी। हिंदू समाज को संगठित करने, उसमें अनुशासन, देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव की भावना जगाने की हेडकेवार की नींव, गुरूजी का विस्तार, देवरस की सेवा, रज्जु भैया का विदेश विस्तार, सुदर्शन का स्वदेशी आग्रह और भागवत का समरसता सन्देश इसका आधार हैं l

आवश्यकता से प्रेरित इस संगठन के शुरुआती स्वयंसेवकों की संख्या मात्र 15-20 थी। पहली शाखा 1926 में शुरू हुई, और 1947 में भारत की आजादी तक यह संगठन महाराष्ट्र और उसके बाहर भी फैल चुका था।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 और आपातकाल (1975–77) के दौरान लगे प्रतिबंध जैसी कई चुनौतियों के बावजूद, आरएसएस का विकास जारी रहा। संगठन ने स्वयं को ढाला और समर्पित जमीनी कार्य के माध्यम से अपनी पहुंच बढ़ाता रहा।

संगठनात्मक ढाँचा एवं कार्यप्रणाली

शाखा प्रणाली: मूल इकाई

आर एस एस की रीढ़ इसकी शाखा प्रणाली है l स्थानीय इकाइयाँ जहाँ स्वयंसेवक प्रतिदिन शारीरिक प्रशिक्षण, बौद्धिक शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों के लिए एकत्रित होते हैं। प्रत्येक शाखा अनुशासन, एकता और सेवा-भाव को बढ़ावा देती है।

शारीरिक गतिविधियाँ: योग, ड्रिल, खेल और आत्मरक्षा प्रशिक्षण।

बौद्धिक सत्र: राष्ट्रीय मुद्दों, इतिहास, संस्कृति और नैतिकता पर चर्चा।

सामाजिक सेवा: आपदा राहत, रक्तदान शिविर और समुदाय विकास के कार्य।

दशकों में, शाखा प्रणाली में उल्लेखनीय विकास हुआ है।

962 में एकमात्र शाखा से बढ़कर, आरएसएस आज भारत और विदेशों में 73,000 से अधिक शाखाएं चला रहा है। हाल के विस्तार का लक्ष्य ब्लॉक और गाँव स्तर रहा है, जहाँ पिछले एक साल में लगभग दस हजार नई शाखाएँ जोड़ी गई हैं।

नेतृत्व पदानुक्रम

आरएसएस एक सुपरिभाषित संगठनात्मक ढाँचे का पालन करता है:· सरसंघचालक: सर्वोच्च मार्गदर्शक और आध्यात्मिक प्रमुख (वर्तमान में मोहन भागवत)।· सरकार्यवाह: महासचिव जो कार्यकारी कार्यों का संचालन करते हैं (वर्तमान में दत्तात्रेय होसबोले)।· प्रचारक: पूर्णकालिक स्वयंसेवक जो संगठन कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।· क्षेत्रीय एवं स्थानीय निकाय: राज्य, जिले और गाँव स्तर पर पदानुक्रमित इकाइयाँ विकेंद्रित किंतु समन्वित कामकाज सुनिश्चित करती हैं।

वित्तीय ढाँचा: पारदर्शिता और स्वावलंबन

आर एस एस को मुख्य रूप से सदस्यों और हितैषियों के छोटे-छोटे दान से धन प्राप्त होता है। यह विदेशी दान स्वीकार नहीं करता है और विश्वास तथा स्वैच्छिक योगदान पर आधारित मॉडल पर चलता है।

धन के स्रोत

· मासिक दान: स्वयंसेवक अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान करते हैं — अक्सर 10 से 500 रुपये प्रति माह।· विशेष अभियान: त्योहारों के दौरान गुरु दक्षिणा जैसे कभी-कभार चलने वाले धन संग्रह अभियान।· निजी दान: उद्यमियों, पेशेवरों और समर्थकों के योगदान जो संघ के मिशन को समर्थन देते हैं।

व्यय का आवंटन

आरएसएस एक पारदर्शी और कुशल वित्तीय प्रणाली बनाए रखता है। प्रमुख व्यय श्रेणियों में शामिल हैं l· संगठनात्मक विस्तार (लगभग 35%): नई शाखाएं खोलना, स्वयंसेवक प्रशिक्षण और आउटरीच।· प्रशिक्षण एवं शिक्षा (25%): विचारशिविर, प्रकाशन और कार्यशालाएं।· सेवा परियोजनाएं (20%): राहत कार्य, शैक्षिक पहल और स्वास्थ्य शिविर।· प्रशासनिक लागत (15%): बुनियादी ढाँचा, लॉजिस्टिक्स और संचार।· वैश्विक गतिविधियाँ (5%): प्रवासी भारतीयों से जुड़े सांस्कृतिक और सेवा कार्यक्रमों को सहयोग। संगठन न्यूनतम ओवरहेड्स पर जोर देता है, जहाँ अधिकांश काम वैतनिक स्टाफ की आवश्यकता को कम करते हुए स्वयंसेवकों द्वारा किया जाता है।

शाखा प्रणाली का विकास

दशकों में शाखा प्रणाली में उल्लेखनीय वृद्धि और अनुकूलन देखा गया है l· 1920-40 का दशक: धीमी लेकिन स्थिर expansion, मुख्यतः महाराष्ट्र और मध्य भारत में।· 1950-70 का दशक: राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद विकास जारी;

युवाओं और छात्रों पर ध्यान बढ़ा।· 1980 – 2000 का दशक: उत्तर भारत, पूर्वोत्तर और तटीय क्षेत्रों में तीव्र विस्तार; किसान, श्रम और शिक्षा जैसे विशेष संघटनों की शुरुआत।

· 2010-वर्तमान: डिजिटल एकीकरण, अधिक समावेशी आउटरीच और ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि।

आज, आर एस एस लगभग हर भारतीय जिले में शाखाएं चलाता है और हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) जैसे संगठनों के माध्यम से इसकी एक नोटाब्ले अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति है l

शताब्दी समारोह और भविष्य की रूपरेखा

आर एस एस अपना एक सौ वर्ष ऐसे कार्यक्रमों और पहलों के साथ मनाया l जो महज उत्सव के बजाय आत्ममंथन, कृतज्ञता और भविष्य की तैयारी पर केंद्रित था। जो प्रमुख गतिविधियों में शामिल हैं

विजयादशमी भाषण: नागपुर में मोहन भागवत का भाषण, जो अगली सदी के लिए विजन रखेगा।· व्याख्यान श्रृंखला एवं सेमिनार: राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और सेवा जैसे विषयों पर बौद्धिक चर्चा।· समुदाय जुड़ाव: अल्पसंख्यकों, आदिवासी समुदायों और राय निर्माताओं तक पहुँचकर संवाद को बढ़ावा देना।· सेवा परियोजनाएं: जन स्वास्थ्य जागरूकता अभियान, वृक्षारोपण अभियान और जल संरक्षण कार्यक्रम।

आर एस एस डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से अपनी पहुँच को आधुनिक बनाने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है, जबकि वह व्यक्ति-से-व्यक्ति जुड़ाव की अपनी मूल पद्धति में रचा-बसा हुआ है।

निष्कर्ष: स्वैच्छिक सेवा का एक मॉडल

आर एस एस एक स्व-निरंतर, स्वयंसेवक-संचालित संगठन का एक अनूठा उदाहरण है, जिसने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया है। अनुशासन, चरित्र निर्माण और राष्ट्र सेवा पर इसका जोर एक पारदर्शी वित्तीय मॉडल के साथ ने इसे एक पूरी सदी तक प्रासंगिक और विकासशील बनाए रखा है।

अपने अगले सौ वर्षों में कदम रखते हुए, आर एस एस का लक्ष्य अपनी सेवा पहलों को और मजबूत करना, समकालीन चुनौतियों के अनुकूल होना और एक मजबूत, एकजुट और सांस्कृतिक रूप से जीवंत राष्ट्र की दिशा में काम करने के लिए भारतीयों की पीढ़ियों को प्रेरित करना जारी रखना है l

भारत के प्रथम सर संघ चालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार 27 सितंबर 1925 से 21 जून 1940 तक पद पर रहें l बीच में नाम मात्र के लक्ष्मण वासुदेव पराजपे 1930 से 1931 तक रहें l इसी तरह माधव राव सदा शिवराज गोलवलकर उपाख्या गुरूजी 21 जून 1940 से 05 जून 1973 तक, मधुकर दत्तात्रेय देवरास उपाख्य वाला साहेब देवरस 05 जून 1973 से 11 मार्च 1994 तक, प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उपख्या रज्जू भैया 11 मार्च 1994 से 10 मार्च 2000 तक, कृपाहल्ली सीता रमैया सुदर्शन 10 मार्च 2000 से 21 मार्च 2009 तक और मोहन भागवत 21 मार्च 2009 से वर्तमान में विधिवत हैं l

आज संघ की स्थापना को सौ वर्ष पूरे हो गए और विश्व में आपको कोई संगठन, कोई राजनीतिक दल ऐसा नहीं मिलेगा जो टुकड़ों में नहीं बंटा हो, इतना ही नहीं इन सौ वर्षों में भारत समेत अनेक देश भी विखंडित हो गए लेकिन संघ “अखंड” रहा है,और देश को परमवैभव की तरफ ले जाने को अग्रसर है l

मीडिया ने हमेशा आर एस एस की छवि को एक हिंदूवादी संगठन के रूप में दर्शाया है l जबकि सही मायने में संघ एक “राष्ट्रवादी” संगठन है l संघ भारतीय संस्कृति को आधार मानकर आगे बढ़ रहा हैं l

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