शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक।
शाहपुरा-अखिल भारतीय साहित्य परिषद की मासिक काव्य गोष्ठी केशव प्रन्यास भवन गांधी पुरी में परिषद् के अध्यक्ष तेजपाल उपाध्याय की अध्यक्षता में आयोजित हुई।
जिसमें मुख्य अतिथि साहित्यकर बाबूलाल चौहान थे। शाहपुरा इकाई द्वारा इस माह का विषय क्रांतिवीर सावरकर, क्रांति,1857 का स्वतंत्रता संग्राम था। जिसमें कवियों ने अपनी कलम से क्रांति के शाब्दिक रंग बिखरे। गोष्ठी की शुरुआत तेजपाल उपाध्याय ने सरस्वती वंदना ‘मां सरस्वती हे शारदे अभिव्यक्ति का मुझे भाव दे’ से की। कवि डॉक्टर परमेश्वर कुमावत ‘परम’ ने ‘सावरकर जो हिन्दू राष्ट्र के प्रबल समर्थक दिखते हैं’ कविता सुनाकर सावरकर के ओजस्वी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।
डॉक्टर कमलेश पाराशर ने ‘जल उठे थे दीप हजारों जब क्रांति की आई बयार’। वरिष्ठ गीतकार बालकृष्ण जोशी ‘बीरा’ ने देशभक्ति गीत ‘देश हमारा प्राणों से प्यारा धरती पर इसको स्वर्ग से उतारा’ सुनाकर गोष्ठी को संगीतमय कर दिया। सी.ए. अशोक बोहरा ने ‘काल कोठरी की काली रातों में वह दीप जलता रहा’ कविता सुनाकर सावरकर के बलिदान को याद किया।
एडवोकेट दीपक पारीक ने ‘अंडमान की काली कोठरियों में जिसने सूर्य उगाया था’। संस्था के अध्यक्ष तेजपाल उपाध्याय ने ‘पहल करने से ही विशिष्टता की पहचान बनती है’। संस्था के महामंत्री ओम माली ‘अंगारा’ ने ‘क्रांति का पथ सुगम नहीं सुलगता यह प्रज्वलित अंगारों से’। रवीद्र सिंह जाड़ावत ने ‘सन सत्तावन याद रहेगा याद रहेगी कुर्बानी’ कविता सुनाकर 1857 की क्रांति में झांसी की रानी के योगदान को शब्दों में अभिव्यक्त किया।
आशुतोष सिंह सोदा ने ‘मैं सिंधु सुता विस्तृत हिमगिरी का अटल भाल हूं’। विश्राम मेघवंशी ‘विष’ ने राजस्थानी भाषा में ‘सुणो सुणाउँ सुणल्यो आज अंगरेजां रा काळा काज’ सुनाकर गोष्ठी को ऊंचाईयां प्रदान की।
गोष्ठी के अंत में बाबूलाल चौहान ने ‘सब इंतजार में थे आए ना लेकर पैमाना’ कविता सुनाई।















