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राजस्थान। सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक- सोमनाथ स्वाभिमान पर्व।

शाहपुरा-राजेन्द्र खटीक। शाहपुरा-श्री प्रताप सिंह बारहठ राजकीय महाविद्यालय शाहपुरा में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन बड़े हर्ष और ऊल्लास के साथ प्राचार्य डॉ पुष्कर राज..

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शाहपुरा-राजेन्द्र खटीक। शाहपुरा-श्री प्रताप सिंह बारहठ राजकीय महाविद्यालय शाहपुरा में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन बड़े हर्ष और ऊल्लास के साथ प्राचार्य डॉ पुष्कर राज मीणा की अध्यक्षता एवं वरिष्ठ संकाय सदस्य प्रो. मूलचंद खटीक के विशिष्ट आतिथ्य में सम्पन्न हुआ।

समारोह में अतिथियों ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम विधिवत रूप से शुरू किया। डॉ. पुष्कर राज मीणा ने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व राष्ट्रीय स्वाभिमान एकता एवं गौरव की भावना का संवर्धन एवं सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है।

डॉ मीणा ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार चंद्रदेव को राजा दक्ष द्वारा जब आप दिया गया था तो ब्रह्मदेव की सलाह के अनुसार गुजरात के प्रभास पाटन के क्षेत्र में कपिल, हिरण एवम् सरस्वती नदियों के संगम स्थल पर भगवान शिव की आराधना करने हेतु बताया।

चन्द्रदेव की आराधना से प्रसन्न होकर उन्हें आप मुक्त किया और चन्द्रदेव ने प्रथम बार स्वर्ण निर्मित सोमनाथ मंदिर का निर्माण किया। शिव पुराण के 13 वें अध्याय, स्कन्द पुराण एवं ऋग्वेद में सोमनाथ का वर्णन मिलता है बाद में इसे रावण ने इसे बांदी से तथा द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने इस मंदिर को चन्दन की लकड़ियों से बनवाया था ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो 649 ईस्वी में वल्लभी के मैत्रेय राजाओं द्वारा निर्मित किया गया जिसे 725 ईस्वी में सिंध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनेद ने तोड़ दिया था।

पुनः भव्य एवं विराट रूप में 815 ईस्वी में गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट ने इसका मध्य रूप में पुनर्निर्माण करवाया। आज से 1000 वर्ष पूर्व 1026 में तुर्क शासक महमूद गजनवी ने 5000 सैनिकों सहित भीषण रक्तपात के साथ इसे नष्ट कर लूट लिया, इस लूट में 20 करोड़ दीनार की संपत्ति प्राप्त हुई थी तथा 70 हजार सनातनियों का रक्तपात हुआ था। राजा भीमदेव एवं मालवा के राजा भोज ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।

1297 ईस्वी से 1412 ईस्वी के मध्य दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी ने इसे 3 बार नष्ट किया और लूटा इसी प्रकार औरंगजेब ने भी इसे 2 बार लूटा और रक्तपात किया। आधुनिक काल में 12 नवंबर 1947 में लोह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के संकल्प से जन सहयोग द्वारा वर्तमान स्वरूप में कैलाश महामेरू प्रसाद शैली में 11 मई 1951 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा जनता को समर्पित किया गया।

इसके प्रथम विनाश के 1000 वर्ष पूर्ण होने एवं जनता को वर्तमान दिव्य रूप में समर्पित होने के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आज सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन सम्पूर्ण भारत वर्ष में हो रहा है। 17 बार नष्ट होने के बाद भी दिव्य-भव्य रूप में अटल खड़ा सोमनाथ इस बात का प्रमाण है कि सृजन सदैव विनाश से भारी रहा है।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि प्रो, मूलचंद खटीक ने बताया कि 12 ज्योतिर्लिंग भारतीय संस्कृति की अनुपम देन है सोमनाथ स्वाभिमान पर्व सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है, जिसे युवा पीढ़ी आत्मसात करती है एवं उन्हें दशा एवं दिशा ज्ञात होती है।

संकाय सदस्य प्रो. दिग्विजय सिंह ने आभार व्यक्त किया। समारोह संकाय प्रो. दलवीर सिंह, प्रो. अतुल कुमार जोशी तथ कर्मचारीगण के साथ कई विद्यार्थियों ने भाग लिया।

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