नेपाल में मधेशी को सम्मान कब मिलेगा ? मधेश प्रदेश, नागरिकता और भाषा का सवाल

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प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

नेपाल एक माला है जिसमें तराई तथा मधेश फूल है। नेपाल को हम हिमाल, पहाड़ और तराई के संगम के रूप में जानते हैं। यहां बोलियां बदलती हैं, पहनावा बदलता है, त्योहार बदलते हैं, लेकिन दिल एक ही धड़कन से धड़कता है। फिर भी पिछले कई दशकों से तराई में एक ही सवाल गूंजता रहा है। सड़क पर, चाय की दुकान पर, घर के आंगन में और अब सोशल मीडिया पर भी। आखिर नेपाल में मधेशी को सम्मान कब मिलेगा।

यह सवाल नफरत से नहीं उपजा। यह सवाल अपनापन न मिलने से उपजा है। यह सवाल उस दर्द से उपजा है जब एक ही देश का नागरिक होने के बावजूद आपको बार-बार यह साबित करना पड़े कि आप भी इसी मिट्टी के हैं।

मधेश नेपाल के दक्षिण में बसा तराई तथा मधेश का इलाका है। यह जमीन उपजाऊ है। यहां की बोली मैथिली है, भोजपुरी है, अवधी है, बज्जिका है। यहां छठ की धूम है, यहां जनकपुर की गूंज है, यहां थारू की संस्कृति है, यहां मुस्लिम भाइयों की अजान है। जनसंख्या के लिहाज से देखें तो नेपाल के आधे लोग इसी तराई में रहते हैं। खेती, व्यापार, मजदूरी, सीमा का कारोबार सब यहीं से चलता है। इसके बावजूद जब देश की तस्वीर बनती है तो उसमें तराई का रंग सबसे फीका दिखता है। पुराने समय में जब नेपाल एक था तब भी दरबार काठमांडू में था। फैसले वहीं होते थे। तराई कर देता था, अनाज देता था, सैनिक देता था, लेकिन पूछ उससे नहीं होती थी। राणा शासन गया, लोकतंत्र आया, राजा गया, गणतंत्र आया, लेकिन तराई की कुर्सी हमेशा कोने में ही रही। स्कूल की किताबों में पहाड़ के वीरों की कहानी थी, तराई के शहीदों का नाम नहीं था। रेडियो और टेलीविजन पर पहाड़ी बोली थी, मैथिली भोजपुरी को लोकभाषा कहकर टाल दिया गया।

सबसे ज्यादा चोट तब लगी जब मधेशी को “भारतीय” कह दिया गया। सीमा पार रिश्तेदारी होना गुनाह कैसे हो सकता है। पहाड़ के लोग भी तो तिब्बत से आते जाते रहे हैं। लेकिन तराई की शादी, बोली और आवाजाही को शक की नजर से देखा गया। एक युवा जब फॉर्म भरता और उपनाम यादव, मंडल, शाह लिखता तो उससे पूछा जाता कि कागज कहां का है। एक छात्रा जब मैथिली में कविता सुनाती तो उसे कहा जाता कि यह नेपाली नहीं है। यही छोटी-छोटी बातें मिलकर एक बड़ा घाव बन जाती हैं।

सन् दो हजार सात में पहली बार तराई सड़क पर उतरा। लोग कह रहे थे हमें संघ चाहिए, हमें गिनती के हिसाब से जगह चाहिए। उसके बाद संविधान सभा बनी और लगा कि अब बात बनेगी। फिर सन् दो हजार पंद्रह आया। नया संविधान बन रहा था। पूरे देश को खुशी थी कि अब नया नेपाल बनेगा। लेकिन तराई में फिर निराशा फैल गई। नागरिकता का नियम उलझा हुआ था। संसद में सीटों का बंटवारा बराबर नहीं था। सीमाओं को इस तरह काटा गया था कि मधेश की आवाज कमजोर हो जाए। पांच महीने तक आंदोलन चला। दुकानें बंद रहीं, सड़कें सुनसान रहीं, घरों में चूल्हे ठंडे रहे। कई मांओं की गोद सूनी हो गई। उसी आंदोलन के बाद संविधान में कुछ शब्द बदले, कुछ वाक्य जुड़े। उस संविधान ने पहली बार तराई को नाम दिया। प्रदेश नंबर दो को मधेश प्रदेश कहा गया। यह छोटा शब्द नहीं था। सदियों बाद पहली बार संविधान के कागज पर “मधेश” लिखा गया। मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका को राष्ट्रीय भाषा माना गया। कहा गया कि सरकारी काम इन भाषाओं में भी होगा। आरक्षण और समावेश की बात हुई। कागज पर सब अच्छा लगा। लगा कि अब शायद सम्मान की सुबह होगी। लेकिन सुबह होने में समय लगता है। कानून बन जाना और कानून का चल जाना दो अलग बातें हैं।

आज भी तराई के हजारों घरों में नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है। बेटी की शादी सीमा पार हुई तो उसकी नागरिकता अटकी है। पिता के पास कागज नहीं था तो बेटे का भविष्य अटका है। बिना नागरिकता के न नौकरी है, न पासपोर्ट, न जमीन का कागज। सरकारी नौकरियों में समावेश का प्रतिशत कागज पर लिखा है। हकीकत में सचिवालय, सेना, पुलिस के बड़े पदों पर चेहरे गिनती के ही हैं। जब कोई मधेशी बड़ा अफसर बनता है तो उसे अपवाद कहा जाता है, नियम नहीं।

सम्मान का सबसे बड़ा सवाल मानसिकता का है। काठमांडू में जब बाढ़ की खबर आती है तो उसे प्राकृतिक आपदा कहा जाता है। तराई में हर साल बाढ़ आती है तो उसे “वहां की नियति” कह दिया जाता है। मधेश में जब कोई नेता बोलता है तो उसे उग्र कहा जाता है। पहाड़ में वही बात कही जाए तो उसे देशभक्ति कह दिया जाता है। मीडिया में तराई की खबर अपराध और आंदोलन तक सीमित रह जाती है। वहां के साहित्य, संगीत, व्यापार, खेल की चर्चा कम होती है। एक तरफ छठ को बड़ी धूम से मनाया जाता है, दूसरी तरफ उसी छठ को करने वालों को अलग नजर से देखा जाता है। यही विरोधाभास चुभता है।

सम्मान का मतलब सिर्फ अधिकार नहीं होता। सम्मान का मतलब है कि जब आप बस में बैठें तो कंडक्टर आपसे पहाड़ी भाषा में टिकट न मांगे और आपसे गुस्सा न हो कि आप मैथिली में जवाब दे रहे हैं। सम्मान का मतलब है कि इतिहास की किताब में जनकपुर का जिक्र अयोध्या के साथ आए, न कि फुटनोट में। सम्मान का मतलब है कि जब देश का झंडा लहराए तो तराई का किसान भी उसे अपना झंडा माने, किराए का नहीं।

पिछले कुछ सालों में चीजें बदली भी हैं। मधेश प्रदेश बना, वहां अपने मुख्यमंत्री हुए, अपने मंत्री हुए। मैथिली में अब फिल्में बन रही हैं, यूट्यूब चैनल चल रहे हैं, कवि सम्मेलन हो रहे हैं। मधेश के डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट, शिक्षक पूरे नेपाल में काम कर रहे हैं। गांव का लड़का अब कहता है कि मैं भी राजदूत बनूंगा। यह हिम्मत पहले नहीं थी। यह बदलाव छोटा नहीं है।

लेकिन अभी मंजिल दूर है। सम्मान तब पूरा होगा जब तराई में उद्योग लगेंगे। जब वहां बड़े अस्पताल होंगे, विश्वविद्यालय होंगे। जब बाढ़ के लिए हर साल राहत नहीं, स्थायी बांध और नहर बनेगी। जब पुलिस थाने में बिना पैसे के एफआईआर लिखी जाएगी। जब सरकारी विज्ञापन मैथिली और भोजपुरी में भी उसी शान से छपेंगे जैसे नेपाली में छपते हैं। इसमें सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। मधेशी नेतृत्व को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। आंदोलन से राजनीति चलती है, लेकिन शासन से घर चलता है।

अगर मधेश प्रदेश में शिक्षा और स्वास्थ्य सुधर जाए, अगर भ्रष्टाचार कम हो जाए, अगर दलित और मुस्लिम और थारू सबको साथ लेकर चला जाए तो कोई भी उंगली नहीं उठा पाएगा। नेतृत्व को यह भी समझना होगा कि नेपाल भारत का विरोधी नहीं है और न भारत नेपाल का। सीमा पर रोटी-बेटी का रिश्ता सदियों पुराना है। उसे ताकत बनाना है, कमजोरी नहीं।

सबसे जरूरी काम आम लोगों का है। पहाड़ के भाई को यह समझना होगा कि मैथिली बोलने वाला कम नेपाली नहीं है। तराई के भाई को यह समझना होगा कि पहाड़ी टोपी वाला दुश्मन नहीं है। जब काठमांडू में तीज की धूम होगी तो जनकपुर की बहनें भी तालियां बजाएं। जब तराई में छठ होगा तो पोखरा का भाई भी दीया जलाए। जब कोई बच्चा दोनों भाषा बोले तो उसे “मिक्स” कहकर न चिढ़ाएं, उसे “नेपाल” कहकर गर्व करें।

सम्मान मांगने से नहीं मिलता। सम्मान कमाने से मिलता है और देने से बढ़ता है। राज्य को देना होगा, समाज को देना होगा। और मधेश को भी यह दिखाना होगा कि वह सिर्फ अधिकार मांगने वाला हिस्सा नहीं है, वह जिम्मेदारी उठाने वाला हिस्सा है। नेपाल का सपना “समृद्ध नेपाल, सुखी नेपाली” का है। यह सपना आधा अधूरा रह जाएगा अगर देश के आधे लोग खुद को मेहमान समझते रहे। संघीयता इसी लिए आई थी कि हर क्षेत्र को अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ने का मौका मिले। मधेश प्रदेश इसी संघीयता की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर मधेश प्रदेश विकास और समरसता का उदाहरण बन गया तो पूरा नेपाल मजबूत हो जाएगा।

आज का युवा पहले से ज्यादा जागरूक है। उसे नारा नहीं चाहिए, उसे नौकरी चाहिए। उसे भाषण नहीं चाहिए, उसे स्कूल चाहिए। उसे सहानुभूति नहीं चाहिए, उसे बराबरी चाहिए। वह यह भी जानता है कि गुस्से से दीवार ऊंची होती है, संवाद से पुल बनता है।

इसलिए इस सवाल का जवाब किसी तारीख में नहीं है। जवाब इस नियत में है कि हम किस नेपाल को बनाना चाहते हैं। क्या हम ऐसा नेपाल चाहते हैं जहां एक समुदाय शासक बना रहे और दूसरा मांगता रहे। या हम ऐसा नेपाल चाहते हैं जहां जनकपुर का दीया और मुस्तांग की हवा दोनों को बराबर जगह मिले।

जिस दिन एक मधेशी मां अपने बेटे से यह नहीं कहेगी कि “बेटा, संभलकर रहना, तुम मधेशी हो”, बल्कि गर्व से कहेगी “बेटा, आगे बढ़ो, तुम नेपाली हो”। जिस दिन एक पहाड़ी शिक्षक क्लास में मैथिली की कविता उतने ही सम्मान से पढ़ाएगा जितने सम्मान से नेपाली कविता पढ़ाता है। जिस दिन संसद में बहस मुद्दे पर होगी, चेहरे पर नहीं। उसी दिन समझिए कि मधेशी को सम्मान मिल गया। यह दिन दूर नहीं है। क्योंकि देश बदल रहे हैं, लोग बदल रहे हैं। इंटरनेट ने दूरियां मिटा दी हैं। अब कोई यह नहीं कह सकता कि उसे पता नहीं था। अब हर आवाज सुनी जा सकती है।

नेपाल एक माला है। उस माला में हिमाल मोती है, पहाड़ धागा है और तराई फूल है। अगर फूल को ही अलग रख देंगे तो माला अधूरी रह जाएगी। माला तभी सुंदर लगेगी जब हर मोती, हर धागा, हर फूल अपनी जगह पर होगा।

इसलिए अब यह पूछना छोड़ना होगा कि सम्मान कब मिलेगा। और यह पूछना शुरू करना होगा कि सम्मान देने के लिए हम आज क्या कर रहे हैं। सरकार नीति बनाए, समाज सोच बदले और मधेश अपनी जिम्मेदारी निभाए। तीनों साथ चलेंगे तो वह सुबह जरूर आएगी जब तराई का हर बच्चा बिना किसी झिझक के कहेगा कि यह मेरा देश है और इस देश को मुझ पर गर्व है। तब जाकर “सबका नेपाल” का नारा सच होगा। और तभी जाकर हम कह पाएंगे कि नेपाल सच में एक है।

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