पट्टीका एक, पैसा दूसरा, नाला तीसरी जगह: विकास के नाम पर धोखा

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प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

मधुबनी जिले के राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी के गेट पर लगी पट्टीका आज भी चमक रही है। नीले रंग पर सफेद अक्षरों में साफ-साफ लिखा है – षष्ठम् राज्य वित्त आयोग योजना, आठ लाख छियानवे हजार तीन सौ छह रुपये। काम होना था पी.सी.सी. सड़क और नाला। जगह भी तय है – गांधी चौक से पूरब, पुस्तकालय के पीछे होते हुए। नीचे अनुशंसाकर्ता का नाम, प्रमुख का नाम, मुखिया का नाम। सब कुछ इतना पुख्ता कि लगे सरकार ने सब सोच समझकर किया है।

लेकिन पट्टीका से आगे जमीन कुछ और कहानी सुनाती है। जहां सड़क बननी थी वहां आज भी कीचड़ है। बरसात में लोग वहाँ पानी में निकलते हैं। और नाला? नाला पुस्तकालय के प्रांगण में बन गया हैं l जो छह महीने भी नहीं हुए टूट गए, जिसे फिर से मरम्मत करना पड़ा l उस जगह का पट्टीका पर जिक्र तक नहीं है। बच्चे जहां किताब लेकर बैठते हैं, वहां अब गंदे पानी की नाली खुदेगी।

सबसे अजीब बात ये है कि अभी भी उसी स्थान पर नाला बनाया जा रहा है। ईंट जुड़ रही है, सीमेंट गिर रहा है, मजदूर काम कर रहे हैं। लेकिन किस योजना से? किस फंड से? इसका कोई बोर्ड नहीं, कोई जानकारी नहीं, कोई चर्चा नहीं। पट्टीका एक योजना की है और काम किसी अनजान फंड से चल रहा है। यही हमारे यहां विकास का असली मॉडल बन गया है। पहले एक योजना स्वीकृत करो, उसकी पट्टीका लगाकर फोटो खिंचवाओ। फिर राशि निकालो। सड़क का पैसा हजम कर जाओ। जब लगे कि लोग सवाल पूछेंगे तो किसी और फंड से उसी जगह आधा-अधूरा काम कर दो। ताकि जांच आए तो दिखा सको कि देखिए काम तो हुआ है।

ष्ठम् वित्त आयोग का पैसा जनता के टैक्स से आता है। सोच थी कि गांव की जरूरत गांव में ही पूरी होगी। पुस्तकालय के पीछे तक की सड़क सैकड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत थी। बच्चे स्कूल जाते, मरीज अस्पताल, बूढ़े बाजार। पर सड़क नहीं बनी। नाला भी नहीं बना जहां बनना चाहिए था। अब बिना बताए, बिना किसी बोर्ड के, लाइब्रेरी के प्रांगण में नाला ठोक दिया जा रहा है।

ये महज गलती नहीं है। ये सोची-समझी साजिश है। कागज पर एक योजना, धरातल पर दूसरी। फाइल में एक जगह, निर्माण दूसरी जगह। और बीच में लाखों का फर्क। कौन सा फंड इस्तेमाल हो रहा है ये कोई नहीं बता रहा क्योंकि बताने से पोल खुल जाएगी। शायद वही पैसा है जो पहले निकाला जा चुका है। शायद नया फंड है जिसे बाद में इसी काम में जोड़ दिया जाएगा।

इस खेल में सबसे ज्यादा नुकसान उस आम आदमी का है जो रोज उस रास्ते से गुजरता है। जिसे सड़क चाहिए थी उसे नाला मिल रहा है और वो भी गलत जगह। जिसे पढ़ने की जगह चाहिए उसे गंदगी मिल रही है। और जिसे जवाब चाहिए उसे चुप्पी मिल रही है।

पंचायत भवन में रजिस्टर भरे पड़े होंगे। MB में सब सही लिखा होगा। लेकिन जमीन पर हकीकत चीख-चीख कर बता रही है कि यहां कुछ गड़बड़ है। पट्टीका झूठ नहीं बोलती, पर पट्टीका के पीछे बैठे लोग झूठ बोलते हैं।

अब सवाल सिर्फ नाले का नहीं रहा। सवाल है जवाबदेही का। सवाल है कि जनता के नाम पर आई राशि गई कहां। सवाल है कि किसके आदेश पर स्वीकृत जगह छोड़कर दूसरी जगह काम हो रहा है। और सबसे बड़ा सवाल – किस फंड से ये नया नाला बन रहा है जिसका कोई हिसाब नहीं?

चुप रहने से ये सिलसिला नहीं रुकेगा। पट्टीका लगी रहेगी, पैसा निकलता रहेगा, और गांव वाले बस देखते रहेंगे। इसलिए अब कागज मांगने होंगे। RTI लगानी होगी। BDO से पूछना होगा, DM से पूछना होगा। कि साहब ये बताइए लाइब्रेरी के प्रांगण में चल रहा ये निर्माण किस योजना का है? उसका प्राक्कलन कहां है? उसकी स्वीकृति किसने दी?जब तक हम ये नहीं पूछेंगे, तब तक हर पट्टीका एक धोखा बनती रहेगी। हर योजना कागज पर पूरी और जमीन पर अधूरी। और विकास के नाम पर हमारा पैसा ऐसे ही हवा में उड़ता रहेगा। “

ये पब्लिक है, सब जानती है” – अब इसे साबित करना है। क्योंकि जानना ही काफी नहीं, अब बोलना भी पड़ेगा।

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